Incest एक परिवार की आत्मकथा (हिंदी संस्करण )

lovestar

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सारा और कबीर खाना खाने के बाद अपनी गाड़ी में बैठ गए और वहा से निकल गए ।
कबीर ने गाड़ी चलाते हुए सारा से कहा -
कबीर - सारा अपना बुर्क़ा उतार के मुझे दे ।
सारा ने कुछ नही कहा और चुप चाप बुर्क़ा उतार के कबीर को दे दिया ।
सारा को शर्म तो बड़ी आ रही थी मगर उसे अब इन चीज़ों में मज़ा आने लगा था ।
सारा अब एक बार फिर कबीर के सामने नंगी हो गयी थी । वैसे तो कार में थी जहाँ कोई उसे देख नही सकता था मगर फिर भी उसे लग रहा था जैसे वो इस वक़्त बीच सडक पे नंगी जा रही हो और ये एहसास ही उसके बदन की गर्मी को बढ़ा भी रहा था और उसकी चूत भी गीली कर रहा था ।
सारा ने अपना बुर्क़ा उतार के कबीर को दिया ।
कबीर ने सारा के हाथ से बुर्क़ा लिया और उसे देखा और सारा से बोला -
कबीर - सारू ये बुर्क़ा तो गन्दा हो गया था ना ।
सारा - जी
सारा के जी कहते ही कबीर ने सारा की आँखों में देखते हुए उस बुर्के को कार से बाहर फेंक दिया ।
सारा ये देखके के चौक गयी और हैरानी से बोली -
सारा - ये क्या किया आपने । मैं घर कैसे जाउंगी ।
कबीर - मैंने बोला था ना तेरे इस नंगे जिस्म पर कपड़े अच्छे नही लगते हैं और वैसे भी तू घर जाने की चिंता मत कर । तू अभी गाड़ी में है और तुझे कोई देख नही सकता ।
कबीर ने गाड़ी चलाते हुए सारा की नंगी जाँघो पर हाथ फेरना शुरू किया जिससे सारा गर्म होने लगी और उसकी एक हलकी सी उम्म्म की सिसकी निकल गयी ।
कबीर ने ये देखते ही अपनी कार दूसरी जगह मोड़ दी और देखते ही देखते वो शहर से दूर एक सुनसान हाईवे पे आ गए थे ।
कबीर ने कार बंद की और सारा के एकदम पास आ गया ।
कबीर के इतना पास आने से दोनों को ही एक दूसरे की गर्म साँसे महसूस हो रही थीं और कबीर ने अगले ही पल अपने होंठ सारा के होंठ से मिला दिए ।
सारा का पूरा बदन कबीर के होठों के स्पर्श से पिघलने लगा और उसने अपनी बाहें कबीर के गले में डाल दीं ।
कबीर ने उसके होठों का रस चूसने के बाद उसे अलग किया और गाड़ी से उतर गया ।
सारा को कुछ भी समझ नही आ रहा था मगर अगले ही पल उसने सारा का गेट खोला और उसे भी अपने साथ बाहर खींच लिया ।
सारा तो डर के मारे अपने आप को छुपाने की कोशिश कर रही थी । उसे लग रहा था की कहीं कोई उसे इस हालत में रात के अँधेरे में सडक पर ऐसे नंगी ना देख ले ।
मगर कबीर उसे खींच के अपने साथ ले गया और उसे कार के बोनट पे लिटा दिया ।
कबीर ने सारा के होंठ चूमने शुरू किये और होंठ चूमते हुए वो सारा के स्तनों को दबाते जा रहा था ।
सारा मस्ती में डूबी उसका आनंद ले रही थी ।
उसके मुँह से धीमे धीमे उम्म... उम्म... की सिसकियाँ निकल रही थीं ।
कबीर ने सारा के होंठ को चूमने के बाद उसके जबड़े को ज़ोर से दबाया जिससे सारा का मुँह खुल गया और कबीर ने तुरंत अपने होठों से उसकी जीभ पकड़ ली और उसे चूसने लगा और एक हाथ से उसकी चूची दबाता जा रहा था ।
सारा की साँसे भारी हो रही थीं और उसके पैरों के बीच एक बार फिर से गीलापन आने लगा था ।
कबीर ने सारा के होंठ और उसकी जीभ चूसने के बाद अपना मुँह उसके स्तन पे लगाया और उसे दबा दबा के चूसने लगा ।
सारा तो जैसे पागल हुई जा रही थी और उसने अपनी बाहें कबीर के गले में डाल दी और मादक आवाज़ में सिसकियाँ लेने लगी ।
सारा - आअह्ह्ह... आह... उम्म्म.... मुझे कुछ हो रहा है... आह... ओह्ह्ह... मेरे पैरों के बीच से कुछ निकल रहा है... उउउफ्फ्फ....
कबीर ने सारा के स्तनों को अच्छे से चूस चूस के लाल कर दिया और चूमते हुए नीचे जाने लगा ।
सारा के बदन की गर्मी बढ़ती जा रही थी और उसके दिमाग पे हवस भारी होती जा रही थी ।
कबीर ने सारा के पेट को चूमते हुए उसकी नाभि के आस पास चूमना शुरू किया तो सारा का पूरा बदन हिलने लगा । कबीर उसकी नाभि को चूम रहा था और उसकी नाभि में अपनी जीभ डालके उसे चाट रहा था ।
सारा का पूरा जिस्म थर थर करके काँप रहा था और वो चिल्लाये जा रही थी ।
सारा - आह... ये कैसा मज़ा है... आह... मुझे ये सुख पहले क्यों नही मिला... ओह्ह्ह... बहुत अच्छा लग रहा है... उफ्फ्फ....
सारा का बदन उत्तेजना के कारण इतना ज़्यादा गर्म हो गया था की उसकी चूत अब अच्छे से रोने लगी थी ।
फिर धीरे धीरे कबीर उसे चूमते हुए नीचे जाने लगा और उसके पेट के सबसे निचले हिस्से को, उसकी चूत के ठीक ऊपर चूमने लगा और अपने हाथ से उसकी चूची मरोड़ने लगा ।
सारा ये हमला बर्दाश्त नही कर पायी और वो अपने चरम पे पहुंचकर झड़ने लगी ।
सारा - मुझे कुछ हो रहा है... आह... कुछ निकल रहा है... ओह्ह्ह... ये कैसा सुख है... अल्लाह... कहाँ थे कबीर तुम इतने सालों तक... उफ्फ्फ... मेरे उड़ रही हूँ... मैं हवा में तैर रही हूँ... ओ मेरे मौला... आह... ऊऊह्ह्ह्ह...
सारा इसी तरह चिल्लाती रही और उसकी चूत बराबर पानी छोड़ती रही ।
सारा ने झड़ने के बाद कबीर को अपनी बाहों में भर लिया और उसे अपने ऊपर लिटाकर वहीं कार के बोनट पे लेटे लेटे अपनी साँसों पे काबू पाने की कोशिश करती रही ।
इस आनंद के बाद, इतने बढ़िया चरम सुख के बाद अब सारा के भट्टी जैसे जलते बदन पे रात की ठंडी हवा पड़ रही थी जो उसे बड़ा ही सुकून दे रही थी ।
थोड़ी देर ऐसे ही कबीर को अपनी बाहों में भरके लेटे रहने के बाद उसने अपनी बाहें खोली और कबीर उसे लेके फिर गाड़ी में बैठ गया और घर चल दिया ।
सारा को अब इस तरह नंगी रहना अच्छा लगने लगा था अब उसे इस तरह रहने में शर्म नही लग रही थी और वो मुस्कुराती हुई ख़ुशी ख़ुशी कबीर के साथ घर जा रही थी ।
घर आके कबीर ने सारा को नहाने भेज दिया और खुद किचन में कॉफ़ी बनाने चला गया ।
सारा ज़ब नहाके आयी तो वो बिलकुल नंगी थी मगर उसके सामने कबीर कॉफ़ी लिए उसका इंतेज़ार कर रहा था और वो भी बिलकुल नंगा था ।
सारा तो कबीर के फौलाड़ी लंड को ही देखे जा रही थी ।
कबीर ने कॉफ़ी एक तरफ रखी और वो सीधा सारा के सामने जाके खड़ा हो गया ।
सारा अभी भी उसके लंड को देखे जा रही थी तो कबीर बोला -
कबीर - सारू, इसे हाथ में लेके देखो । ये भी तुम्हारे प्यार के लिए मारा जा रहा है ।
कबीर के लंड ने सारा पे ना जाने कैसा जादू कर दिया था की एक ही पल में सारा ने उसके लंड को अपने हाथ में ले लिया और उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया ।
कबीर के मुँह से आअह्ह्ह... निकल गयी ।
कबीर के मुँह से आह निकलते ही सारा होश में आयी और कबीर को देखने लगी मगर कबीर का लंड अभी भी उसके हाथ में था ।
कबीर ने सारा से कहा -
कबीर - सारू, इसे अपने हाथ से सहलाओ । अपने हाथ को आगे पीछे करते हुए इसे हिलाओ ।
और सारा के हाथ अपने आप चल दिए ।
सारा अब तेज़ी से अपने हाथ से कबीर का लंड हिला रही थी और कबीर आहें भर रहा था ।
कबीर - ओह्ह्ह सारू... आह... ऐसे ही हिलाती रहो... उउउफ्फ्फ....
सारा के इस कदर हिलाने से कबीर ने थोड़ी ही देर में अपने वीर्य की खूब सारी पिचकारी मारी जिससे सारा का पूरा हाथ ख़राब हो गया और सारा अपने हाथ धोने चली गयी ।
सारा हाथ धोके के आयी तो कबीर ने उसे अपने साथ चिपका के बिठा लिया और दोनों ने साथ मैं कॉफ़ी पी ।
कॉफ़ी पीने के बाद कबीर ने सारा को अपनी बाहों में भरा और उसके साथ लेट गया ।
कबीर सारा के बालों से खेल रहा था और सारा कबीर की आँखों में देख रही थी ।
कबीर ने सारा से बात शुरू की ।
कबीर - कैसा लगा आज ।
सारा - अच्छा ।
कबीर - और करना है ।
सारा - हाँ
कबीर - रोज़ करेगी ।
सारा - हाँ
कबीर - ज़ब भी मैं बोलूं ।
सारा - हम्म्म...
कबीर ने सारा का हाथ अपने लंड पे रखा और सारा से पूछा -
कबीर - पसंद आया सारू ।
सारा ने शर्माके अपना सर कबीर के सीने में छुपा लिया और धीमे से बोली -
सारा - हम्म
कबीर - कल का क्या हिसाब किताब है
सारा - आप बोलो । आपने तो मेरा स्कूल भी बंद करा रखा है ।
कबीर - अच्छा कल का पूरा दिन तेरे नाम । बस थोड़ी देर के लिए घर जाऊंगा फिर वापस आ जाऊंगा । उसके बाद पूरा दिन तेरे साथ ।
कबीर की ये बात सुन सारा ख़ुशी से चहकते हुए बोली -
सारा - सच
कबीर - मुच
सारा ने ख़ुशी में कबीर के होठों को चूम लिया ।
कबीर - अब सो जाएं । फिर सुबह उठना भी है ।
सारा - आप सो जाइये ना । मुझे नही सोना । मुझे तो बस आपको देखना है ।
और इसी तरह दोनों मीठी मीठी बातें और प्रेम करते हुए एक दूसरे की बाहों में सो गए ।
अगले दिन सुबह जब सारा की नींद खुली तो उसने अपने आपको कबीर की बाहों में पाया ।
कबीर को अपने पास देख वो ख़ुशी से झूम उठी और उसने कबीर के गाल चूम लिए जिससे कबीर की भी नींद खुल गयी ।
कबीर ने भी उसके गाल चूम लिए और वो दोनों उठ गए ।
कबीर ने उसे फ्रेश होने के लिए बोला ।
सारा ने अपने कपड़े निकाले और फ्रेश होने के लिए जाने लगी तभी पीछे से कबीर की आवाज़ आयी -
कबीर - सारू, रहने दे ना ।
कबीर ने इतने प्यार से बोला तो सारा ने अपने कपड़े वहीं छोड़ दिए और कबीर के पास आके उसके होंठ चूमने लगी ।
थोड़ी देर बाद उसने कबीर को छोड़ा और वो मुस्कुराती हुई बाथरूम में जाने लगी तो कबीर भी उठके किचन में चला गया ।
सारा फ्रेश होके आयी और कबीर भी फटाफट चाय नाश्ता बना के ले आया ।
सारा बिस्तर पे आके कबीर की गोद में बैठ गयी और कबीर उसे अपने हाथ से नाश्ता कराने लगा ।
दोनों अभी भी नंगे ही बैठे थे और सारा की नरम मुलायम गांड ने कबीर के लंड को खड़ा कर दिया था जो उसे अब चुभ रहा था मगर सारा अभी भी उसकी गोद में बैठी मुस्कुराती हुई नाश्ता कर रही थी ।
कबीर ने सारा को नाश्ता कराया और दोनों ने चाय पी ।
चाय पीने के बाद कबीर बोला -
कबीर - सारू, अब मैं चलता हूँ अपने घर । मैं थोड़ी देर में आ जाऊंगा । और अगर कुछ काम हो या कोई बात हो तो मुझे फ़ोन कर लेना ।
सारा - जी
सारा कबीर को गेट तक छोड़ने आयी और उसे ज़ोर से गले लगाके बोली -
सारा - जल्दी आना, मैं राह देखूंगी ।
कबीर के मुँह से बस एक ही शब्द निकला - हाय...
और वो चला गया और सारा भी मुस्कुराती हुई अन्दर आ गयी ।
 

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इधर कबीर घर पहुंचा तो कामीनी ने दरवाज़ा खोला ।
कामीनी उस वक़्त साड़ी में थी और कहर ढा रही थी ।
कबीर ने उसे वहीं पे दबोचा और उसके स्तनों का मर्दन करने लगा ।
कामीनी कबीर के इस बर्ताव से सकते में थी । वैसे मज़ा तो उसे भी आ रहा था मगर कबीर का ये रूप उसके लिए नया था ।
अब बेचारी कामीनी को कौन बताये की आखिर कबीर के साथ रात भर में क्या क्या हुआ और वो चूत के लिए कितना तरसता रहा । वो तो बेचारा समुन्दर में रह के भी प्यासा रहा ।
कबीर ने कामीनी के स्तनों को इतना तेज़ दबाया की कामीनी की चीख निकल गयी ।
कामीनी - आअह्ह्ह... आज क्या मार ही डालोगे । छोडो मुझे दर्द हो रहा है ।
मगर कबीर कहाँ सुनने वाला था वो तो बस कामीनी के स्तनों को दबाके उनका सर रस निचोड़ देना चाहता था ।
कबीर द्वारा किये गए इस भयंकर स्तन मर्दन ने कामीनी के ब्लाउज के दो बटन तोड़ दिए । अब तो कबीर पे जैसे शैतान सवार था । उसने कामीनी के ब्लाउज को दोनों हाथों में पकड़ा और कुछ ही पलों में बड़ी ज़ोरदार चर्रर्रर्र की आवाज़ आयी और कामीनी का ब्लाउज छोटे से रुमाल की तरह दो तीन टुकड़ों में नीचे पड़ा था ।
कामीनी कबीर की इस हैवानियत से थोड़ा सहम गयी थी । ये और बात थी की कामीनी को हमेशा से ही ऐसी धुआंधार चुदाई पसंद थी मगर अभी सुबह का समय था और वो दोनों ही दरवाज़े पे खड़े थे ।
कामीनी कबीर से कुछ कहने ही वाली थी की तभी कबीर ने अपने होठों से उसे चुप करा दिया ।
कबीर के होठों ने जैसे किसी बाज़ की तरह अपना शिकार ढूँढ़ते हुए उसके होठों पर झपट्टा मारा ।
कामीनी छटपटाने लगी थी मगर कबीर तो जैसे अपने होश में नही था ।
कबीर ने कामीनी के होठों को चूसते हुए बारी बारी ऊपर और नीचे वाले होंठ को काट लिया ।
कामीनी की सांस भारी हो रही थी और उसके बंद होठों से बस गु... गु... गु... उम्म... उम्म... उम्म... की आवाज़ें आ रही थीं ।
कबीर ने कामीनी के मुँह में अपनी जीभ डाली और उसे खींच खींच के चूसने लगा ।
कामीनी की जीभ को चूसने के साथ ही कबीर के हाथ उसकी छाती पर आ पहुंचे और उसे दुबारा निचोड़ने लगे ।
कामीनी कबीर को धकेल कर दूर कर रही थी मगर कबीर ने इतनी ताकत से उसके स्तनों को पकड़ा हुआ था की वो बेबस थी । उसे लगातार दर्द हो रहा था और वो बस छटपटाये जा रही थी ।
कबीर ने कामीनी की जीभ और उसके होंठ छोड़ें तो तुरंत उसकी गर्दन पकड़ ली और उसकी गर्दन को चूमने लगा ।
कामीनी की सिसकियाँ उसके मुँह से निकल रही थीं ।
कामीनी - आअह्ह्ह... उम्म्म... क्या करते हो आप ओह्ह्ह... छोड़िये ना मुझे... आह... दर्द होने लगा है... उफ्फ्फ....
कामीनी का ये कहना ही था की कबीर ने अपने दाँत उसकी गर्दन पे गड़ाए और ज़ोर से काटा जैसे अपने प्रेम की निशानी छोड़ रहा हो ।
कामीनी फिर दर्द से चिल्ला उठी ।
कामीनी - आह... मम्मी... मर गयी... कोई बचाओ मुझे... आह... आज मार डालोगे क्या... उई...
कबीर ने कामीनी के गर्दन पे अपनी प्रेम की निशानी छोड़ने के बाद उसे दुबारा चूमना शुरू किया और कुछ ही पलों में एक बार फिर एक ज़ोरदार आवाज़ आयी चर्रर्रर्र... और अब बारी थी कामीनी की ब्रा की जो चिन्दीयों के रूप में नीचे पड़ी थी ।
कामीनी बहुत ज़्यादा घबरा गयी और डरते डरते बोली -
कामीनी - सुनिए जी, आज आप क्या मेरे सारे कपड़े फाड़ देंगे ।
मगर कबीर इस बार भी कुछ ना बोला और अब कबीर ने कामीनी के स्तनों को मुँह में भर लिया और चाटने लगा ।
कामीनी आह... ओह्ह्ह... उह्ह्ह... उम्म्म... उफ्फ्फ... करती रही और कबीर उसके स्तनों को दबाता रहा और चूमता रहा ।
कामीनी की चूत इस वक़्त इतनी ज़्यादा गीली थी की उसकी चूत के पानी ने उसकी दोनों टांगों को भिगो दिया था । कामीनी मस्ती में सिसकियाँ ले रही थी और अपने स्तनों पे कबीर के सर को दबाते हुए अपने पैर आपस में रगड़ रही थी ।
उधर कबीर ने कामीनी के दोनों स्तनों का हुलिया बिगाड़ने के बाद उसे छोड़ा तो कामीनी बोली -
कामीनी - आज इतनी सुबह सुबह क्या हो गया आपको । आप कुछ कहते क्यों नही ।
अभी कामीनी का ये कहना हुआ और कबीर ने उसकी साड़ी के पल्लू को पकड़ के ज़ोर से खींचा जिससे साड़ी तो कामीनी के शरीर से अलग हो ही गयी लेकिन कामीनी भी घुमते हुए कबीर की बाहों में समाती हुई उसके साथ ही बाहर बने गार्डन में जाके गिरी ।
कबीर ने तुरंत उसे पलट कर अपने नीचे किया और अपना हाथ उसके पेटीकोट पे रखा ।
कामीनी समझ गयी की अगले प्राण अब पेटीकोट के ही निकलेंगे और वो अपना हाथ बढ़ाके उसे बचाने के लिए नीचे ले गयी ।
मगर अफ़सोस कामीनी ने इस बार भी देर कर दी और अब कामीनी का पेटीकोट उसके घर के दरवाज़े के पास पड़ा था और कामीनी के हाथ में कुछ था तो बस पेटीकोट का नाड़ा ।
अब कामीनी ने हार मान ली थी । वो समझ गयी थी की अब दुनियाँ की कोई ताकत कबीर को रोक नही सकती इसलिए कोशिश करना भी बेकार है और वो चुप चाप लेटी रही ।
कबीर ने कामीनी के पेटीकोट के फटते ही उसकी जाँघो पर धावा बोला और उन्हें चाटने लगा ।
कामीनी ने अपनी आँखें बंद कर ली और सिसकियाँ लेने लगी ।
कबीर अब कामीनी की जाँघो से ऊपर उठता हुआ उसकी चूत की तरफ जा रहा था ।
कबीर ने उसकी चूत पे पहुँचते ही उसका अंतिम और इकलौता बचा वस्त्र उसकी पैंटी को भी खींच के फाड़ दिया और अपना मुँह लगा लिया ।
कामीनी - आह... क्या कर रहे हैं आप... ओह्ह्ह.. चबा डालो इसे... उउफ्फ्फ...
कबीर ने कामीनी की चूत को फैलाके अच्छे से चाटना शुरू किया तो कामीनी अपना आपा खो बैठी और कबीर के सर को ज़ोर ज़ोर से अपनी चूत पर दबाने लगी ।
कामीनी की इस हरकत से कबीर समझ गया था की उसकी चूत उफान पर है और वो कभी भी झड़ सकती है इसलिए कबीर ने उसकी चूत चाटनी बंद कर दी और अलग हो गया ।
कामीनी तड़प के रह गयी क्योंकि उसकी चूत झड़ते झड़ते रह गयी । वो तो बस कबीर को घूरे जा रही थी मगर कबीर जानता था की अगर कामीनी झड़ गयी तो वो अपनी चूत मारने नही देगी ।
अभी कामीनी घूर ही रही थी की कबीर ने अपना लंड उसकी चूत पे रखा और झटका लगाया ।
कामीनी की चूत में कबीर ने अपना आधा लंड डाल दिया था ।
कामीनी को दर्द हो रहा था मगर वो खुद भी इतनी गरम हो गयी थी और उसकी चूत भी इतनी जल रही थी की वो दर्द सहन करती रही मगर कुछ नही बोली ।
कबीर ने एक और झटका मारा और पूरा लंड कामीनी की चूत में उतार दिया ।
कामीनी की हलकी सी चीख निकल गयी ।
कामीनी - आह... धीरे करिये ना... मै रोक थोड़ी रही हूँ आपको... उउफ्फफ्फ्फ़....
कबीर ने अपना लंड बाहर निकला और कामीनी की आँखों में देखते हुए एक करारा झटका मारा और अपना पूरा लंड एक ही बार में उसकी चूत में उतार दिया ।
कामीनी की आँखों से आंसू निकल आये और चीख इस बार बड़ी ज़ोरदार थी ।
कामीनी - आआआआआहहहहहह..... मर गयी मैं... अरे... कोई बचाओ... मुझे... ओह्ह्ह... आआहहहह....
कामीनी की इस जानदार चीख को बाहर सडक से निकलने वाले किसी शख्स ने सुन लिया और एक आवाज़ आयी -
अनजान शख्स - भाभीजी क्या हुआ, आप ठीक तो हैं ।
ये बात सुनके कामीनी की डर के मारे गांड ही फट गयी । वैसे बाहर से उनके घर के अंदर कोई देख नही सकता था मगर बात ये थी की इस चीख का वो क्या जवाब देगी ।
कामीनी - जी मैं ठीक हूँ ।
अनजान शख्स - तो आप इतनी ज़ोर से चीखी क्यों ।
कामीनी - वो मेरा पैर फिसल गया और शायद मोच आयी है ।
उधर कबीर चुदाई करने में व्यस्त था ।
अनजान शख्स - मैं आऊं क्या भाभीजी मदद के लिए ।
कामीनी कुछ बोलती इससे पहले ही कबीर ने आधा लंड बाहर निकाल और तुरंत एक झटके में अंदर डाल दिया जिससे कामीनी की फिर से चीख निकल गयी ।
कामीनी - आआहहहह... उई माँ... ओह्ह्ह...
अनजान शख्स - भाभीजी कबीर को बुला लो मदद के लिए ।
कामीनी - हाँ वो आ आ गए हैं मेरे पास ।
अनजान शख्स अपने मन में सोचते हुए - वो आ गए हैं.... शायद गलती से निकल गया होगा मुँह से ।
अनजान शख्स - ठीक है भाभीजी ।
उधर वो अनजान शख्स चला गया और इधर कबीर ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई ।
कामीनी हर धक्के के साथ आह... आह... आह... कर रही थी और कबीर उसे ताबड़तोड़ चोदे जा रहा था ।
करीब 10 मिनट के बाद कबीर और कामीनी एक साथ झड़ गए । कबीर ने अपना सारा वीर्य कामीनी की चूत में डाल दिया था और अब दोनों लेटे हुए हांफ रहे थे ।
कुछ ही देर में ज़ब कामीनी और कबीर की साँसे सामान्य हुई तो कामीनी बोली -
कामीनी - ये आपको क्या हो गया था । आज तो आप मरवा ही देते ।
कबीर मुस्कुराते हुए बोला -
कबीर - वैसे मज़ा नही आया क्या
कामीनी - आपका बस चले तो आप मुझे बीच सडक पे ही चोद दोगे । वैसे मज़ा तो खूब आया ।
कबीर अब उठके अंदर जाने लगा और जाते जाते उसने पलट कर कामीनी को देखा और कहा -
कबीर - वैसे ख्याल तो बढ़िया है ।
और ये कहके कबीर मुस्कुराता हुआ अंदर चला गया और कामीनी वहीं पड़े पड़े कबीर को जाते देखती रही ।
कबीर तो अंदर चला गया मगर कामीनी वहीं गार्डन में पड़ी रही । उसे तो अभी भी इस घनघोर और धुआंधार चुदाई की कशिश ने घर रखा था और वो मुस्कुराते हुए उन्हीं बीते हुए खुशगवार लम्हों के बारे में सोचती रही ।
थोड़ी देर बाद अंदर से ज़ब उसे स्वीटू की आवाज़ सुनाई दी तब जाके उसे होश आया और वो हड़बड़ाके उठी । उसके कपड़े तो चिन्दी बनके सब तरफ बिखरे हुए थे । उसने फटाफट अपनी सारी चिन्दीयां बटोरी और अपने स्तनों से लेकर अपनी गांड तक मटकाती हुई अंदर जाने लगी ।
स्वीटू ने जैसे ही दृश्य देखा उसका मुँह खुल गया और वो बोली -
स्वीटू - मम्मी... ये सुबह सुबह कहाँ से नंगी चली आ रही हो । घूमने ही जाना था तो कुछ पहन तो लेती ।
कामीनी - चल हट... तुझे क्या करना । तू अपना काम कर ।
स्वीटू - मम्मी... सच सच बताओ । पापा ने चोदा क्या ।
कामीनी - तू कभी नही सुधरेगी । क्या उल्टा सीधा बक रही है । अब वो नही होंगे तो और कौन होगा मेरे साथ । वो ही चोदेंगे ना मुझे की मोहल्ले वाले चोदेंगे ।
स्वीटू - आये हाय... तो मेरी माँ सुबह सुबह पापा का लंड खाके आ रही है वो भी बाहर से ।
स्वीटू ये बोलके हसने लगी और कामीनी शर्माने लगी मगर झूठा गुस्सा दिखाते हुए वो स्वीटू को मारने भागी ।
कामीनी - रुक अभी तुझे बताती हूँ । बड़ी दिलचस्पी है ना तुझे मेरी चुदाई में ।
इधर कामीनी उसे मारने भागी तो उधर स्वीटू भाग के ऊपर आ गयी ।
स्वीटू जब कबीर के कमरे के सामने से निकली तो उसे कबीर दिखा जो बिस्तर पे आँखें बंद किये लेटा कुछ सोच रहा था । वो उसके कमरे में चली गयी और उसके पैरों के पास खड़ी हो गयी ।
कबीर को स्वीटू के आने का पता ही नही चला । वो तो अपनी ही सोच में डूबा हुआ था ।
कबीर कच्छे में लेटा था और स्वीटू उसके कच्चे को ही देख रही थी ।
स्वीटू ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और कबीर के कच्छे को थोड़ा सा नीचे खींच दिया ।
कबीर ने एकदम से आँखें खोली तो पहले उसने स्वीटू को देखा और फिर अपने कच्छे को ।
स्वीटू ने कबीर की आँखों में देखते हुए अपने होंठ उसके लंड पे रख दिए और कबीर ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें दुबारा बंद कर ली ।
स्वीटू को तो जैसे इजाज़त मिल गयी थी । उसने तुरंत ही अपना मुँह खोला और कबीर के लंड को अपने मुँह में भर लिया ।
कबीर ने बड़ी मीठी सी आवाज़ में उउउम्म्म... किया जिससे स्वीटू का ख़ुशी से जोश दुगना हो गया और वो पूरी ताकत से उसे चूसती रही ।
स्वीटू की इस जादुई काला ने कबीर को अपने चरम पे पहुंचा दिया और वो झड़ने के करीब आ गया मगर उसने कुछ नही कहा । वो बस आँखें बंद किये मज़े लेता रहा ।
कबीर ने स्वीटू के मुँह में ही अपना सारा वीर्य छोड़ दिया और स्वीटू की प्यास भुजा दी ।
स्वीटू भी कबीर का सारा वीर्य पी गयी और उसके लंड तो चाटके उठ गयी ।
स्वीटू ने कबीर के पास जाके धीरे से कहा -
स्वीटू - थैंक यू पापा ।
और स्वीटू कमरे से बाहर चली गयी ।
स्वीटू के जाने के कुछ देर बाद कबीर उठा और नहाके आया और नीचे चला गया । उसने जाके कामीनी और स्वीटू से बोला की चलो आज मामा के घर चलते हैं ।
स्वीटू और कामीनी मामा के घर जाने का सुनते ही खुश हो गए ।
स्वीटू और कामीनी नहाने चले गए और कबीर ऊपर आके अपने लैपटॉप पर काम करने लगा । थोड़ी देर बाद उसने एक कुछ प्रिंट आउट निकाले और उन्हें ले जाके गाड़ी में रख दिया और वापस आके उसने थोड़ी देर टी वी देखा तब तक कामीनी और स्वीटू भी तैयार होके आ गए ।
तीनों ने मिलके नाश्ता किया और निकल गए मामा के घर ।
मामा मतलब महेंद्र प्रताप सिंह के घर पहुंचे और पुष्पा ने कामीनी को गले लगा लिया । उसके बाद कबीर ने पुष्पा के पैर छुए और स्वीटू पुष्पा के गले लग गयी ।
सभी लोग अंदर आ गए ।
पुष्पा कामीनी और बच्चों को देखके बड़ी खुश थी ।
उसने तेज़ आवाज़ में बोला -
पुष्पा - बच्चों... अरे शमा... तमन्ना... देखो तो कबीर और स्वीटी आये हैं ।
वैसे तो बच्चे अपने अपने कमरों में पढ़ रहे थे मगर पुष्पा की आवाज़ सुनके शमा तो भागी भागी नीचे आ गयी और तमन्ना वहीं से चिल्लायी -
तमन्ना - आयी माँ... बस 2 मिनट ।
तमन्ना का चेहरा कबीर का नाम सुनते ही चमक उठा था । वो फटाफट आईने के सामने गयी और अपना चेहरा और बाल ठीक किये । फिर उसने एक नज़र अपने आपको देखा और शर्मा गयी ।
तमन्ना ने टॉप और स्कर्ट पहन रखा था और उसमें वो सुन्दर लग रही थी ।
तमन्ना अपने कमरे से निकली और कुछ सोच के वापस अंदर आ गयी और अपने कपड़े बदलने लगी ।
उसने जल्दी से अपना टॉप स्कर्ट उतारी उसके बाद ब्रा और पैंटी भी निकाल दी । फिर उसने एक बड़े से गोल गले का टॉप पहना और नीचे एक मिनी स्कर्ट डाली जो की उसकी आधी जाँघे ही छुपा पा रही थी ।
और वो अपना है हुलिया देखके मुस्कुराई और नीचे आ गयी ।
कबीर ने तमन्ना तो देखा तो देखता ही रह गया ।
उसे एक ही झटके में समझ में आ गया की तमन्ना ने ब्रा नही पहनी थी । तमन्ना की उछलती हुई छातियाँ इस बात की गवाही दे रही थीं । उसका लंड में फिर से हलचल शुरू हो गयी ।
तमन्ना ये सब देख रही थी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी ।
तमन्ना कबीर के पास जाके उसके गले लगी और अपनी छाती को उसके सीने में दबाती ही चली गयी ।
कबीर तमन्ना के इस रूप से अभी तक अनजान था । वो समझ नही पा रहा था की आखिर ये लड़की चाहती क्या है । इसे अचानक हो क्या गया ।
थोड़ी देर तक सबने बैठके बातें की तब तक सबके लिए चाय और समोसे आ गए ।
अभी सब लोग बातें करते हुए चाय पी रहे थे की कबीर के मोबाइल में सारा का मैसेज आया ।
सारा - आप कब तक आएंगे ।
कबीर ने ये मैसेज पढ़ा और देखा की 10 बज गए थे ।
उसने सारा को मैसेज किया -
कबीर - निकल रहा हूँ । कुछ देर में आता हूँ ।
सारा - जी.. आ जाइये...
कबीर ने मोबाइल रखा और कामीनी के पास जाके बोला -
कबीर - मुझे अभी जाना पड़ेगा ।
कामीनी - क्यों... मेरा मतलब एकदम से ।
कबीर - हाँ... वो मेरा जो दोस्त है, जिसकी तबियत ख़राब है, उसको अस्पताल में शिफ्ट कर रहे हैं । उसकी हालत बिगड़ती ही जा रही है ।
कामीनी - अरे...
कबीर - हम्म्म... अच्छा सुन... घर जाने की जल्दी तो है नही । मैं शाम को यहीं लेने आ जाऊंगा ।
कामीनी - अरे आप परेशान क्यों होते हो । मैं इतने दिनों के बाद तो अपनी भाभी से मिली हूँ तो ऐसा करती हूँ की स्वीटू के साथ आज रात यहीं रुक जाती हूँ । आप अपना काम देख लो पहले ।
कबीर तो मन में बड़ा खुश हुआ और सोचने लगा -
कबीर - वाह कम्मो... तूने तो मेरी मन की मुराद पूरी कर दी ।
कबीर ने सबको अपनी परेशानी बताई और सबसे आज्ञा लेके चल पड़ा ।
इधर कबीर के जाने से तमन्ना को बुरा तो बहुत लगा । मगर अगले ही पल वो खुद से कहने लगी -
तमन्ना - जाओ भाई जाओ... मैं भी तो देखूँ कब तक मुझसे बचोगे । एक ना एक दिन तो तुम्हे मेरी बाहों में आना ही होगा ।
और तमन्ना मुस्कुराने लगी ।
 

lovestar

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कबीर अपनी गाड़ी लेके अपनी मामी के घर से निकला ही था की उसे सिगरेट की तलब लगी और उसकी सारी सिगरेट ख़त्म हो चुकी थीं ।
उसने रास्ते में गाड़ी रोकी और एक पान की दूकान पर अपनी सिगरेट लेने चला गया और पान वाले से बोला -
कबीर - एक विल्स का पैकेट देना ।
अभी वो सिगरेट ले ही रहा था की तभी उसकी नज़र सडक के दूसरी तरफ गयी और उसने जो देखा उसके बाद उसके मुँह एक ही बात निकली -
कबीर - अबे... इसकी माँ का...
हुआ यूँ की एक लड़का बड़ी तेज़ी से भाग रहा था और करीब 10 आदमी उसके पीछे भाग रहे थे उसे मारने के लिए । उस लड़के के कपड़े भी फटे हुए थे और शरीर पर काफी चोटें थीं जो अच्छा खासा खून बहा रही थीं ।
कबीर को समझते देर ना लगी की ये भागने वाला कोई और नही बल्कि मेथी था ।
जी हाँ मेथी बोले तो मेथस्वी चंद्रवंशी उर्फ़ मेथी ।
कबीर ने फटाफट सिगरेट लेके अपनी गाड़ी भगाई और मेथी के सामने लाके रोक दी ।
गाड़ी से बाहर निकलने पर मेथी ने कबीर को जैसे ही देखा वो तुरंत उसके गले लग गया और रोने लगा ।
अभी कबीर उसको चुप कराता उससे पहले ही वो आदमी मेथी को मारने आ गए ।
एक आदमी ने जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया मेथी को पकड़ने के लिए इतने में कबीर ने पूरे शरीर की ताकत लगा के एक लात उसकी छाती पे मारी ।
छाती पे लात पड़ते ही वो आदमी 6 फ़ीट दूर जाके गिरा और उसके मुँह से खून आने लगा ।
ये देखके दूसरा आदमी चिल्लाया -
दूसरा आदमी - कौन है बे तू ।
ये सुनके कबीर बोला -
कबीर - पहले वहां पड़े उस आदमी को देख जो खून उगल रहा है । अब बता शांति से बात करेगा या मरेगा ।
वो आदमी कुछ बोलता इससे पहले कबीर ज़ोर से चिल्लाया -
कबीर - जल्दी बोल....
कबीर के चिल्लाने से सडक पर गुजरने वाले लोग भी रुक गए और देखने लगे ।
दूसरा आदमी - इसने हम से माल लिया था और अभी तक उसका पैसा नही दिया ।
कबीर - कौन सा माल ।
दूसरा आदमी - दारु, सफ़ेद पाउडर, गोलियां...
कबीर ये बात सुनके पलटा और मेथी के सर पे धीरे से मारते हुए बोला -
कबीर - क्या बे भोसड़ीके... ये क्या रायता फैला रखा है तूने ।
मेथी - मारो मत भैया । मुझसे गलती हो गयी । मुझे बचा लो वरना ये लोग मुझे मार ही डालेंगे ।
कबीर - क्यों....
मेथी - भैया वो पार्टी करनी थी दोस्तों के साथ ।
कबीर - तू मर जा गांडू । तुझे पहले भी समझाया था मगर तेरे दिमाग में कुछ जाता ही नही । तू सच में मंद बुद्धि है अपने नाम मेथस्वी की तरह । चल फ़ोन दे तेरा ।
मेथी - भैया पापा को कुछ मत बताना, मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ । पापा मुझे गोली मार देंगे ।
कबीर उसकी एक नही सुनता और उसका फ़ोन छीन लेता है ।
कबीर जैसे ही फ़ोन खोलता है तो उसे एक फोटो दिखती है बड़ी सुन्दर सी लड़की की ।
कबीर मेथी को फ़ोन दिखा के पूछता है -
कबीर - ये कौन है बे ।
मेथी - ये मेरी दीदी हैं ।
मेथी की ये बात सुनके कबीर की भौहें खड़ी हो जाती हैं ।
तभी पीछे से आवाज़ आती है -
आदमी - ऐ लड़के... जल्दी ख़त्म कर तेरा भरत मिलाप ।
कबीर - रुक...
कबीर दुबारा मेथी से बात करता है -
कबीर - मैं तुझे बचा लूंगा मगर मुझे क्या मिलेगा ।
मेथी - भैया आप जो बोलोगे मैं करूँगा ।
कबीर - सोच ले ।
मेथी - हाँ भैया... बस मुझे बचा लो इन लोगों से ।
कबीर - ठीक है ।
अब कबीर वापस उस आदमी से बात करता है ।
कबीर - कितने पैसे हैं तेरे ।
आदमी - एक लाख ।
कबीर - रुक यहीं मैं पैसे लेके आया और खबरदार अगर किसी ने मेथी को हाथ भी लगाया तो जान से जाएगा ।
आदमी - ठीक है ।
कबीर मेथी को गाड़ी में बिठाके चला जाता है और ऐ टी एम से पैसे निकाल के उस आदमी को देता है और साथ में बीस हज़ार और देता है ।
कबीर - ये बीस हज़ार ले और उस आदमी का इलाज करा लेना । और खबरदार अगर दुबारा मेथी के आस पास भी दिखे ।
वो लोग पैसे लेके चले जाते हैं ।
कबीर पहले तो मेथी की मरहम पट्टी करता है फिर उसे कुछ नए कपड़े दिलाता है ।
मेथी का हुलिया ठीक करने के बाद दोनों एक कॉफ़ी शॉप पे जाके कॉफ़ी पीते हैं और बातें करते हैं ।
मेथी - थैंक यू भैया आपने मुझे बचा लिया ।
कबीर - साले थैंक यू के बच्चे, तेरे चक्कर में मेरे लाख रूपए चले गए उसकी भरपाई कौन करेगा, तेरा ससुर...
मेथी - सॉरी भैया... माफ़ कर दो... आप बोलो आपको मुझे क्या चाहिए ।
कबीर - मुझे तेरी दीदी पसंद है । दोस्ती करवाएगा मुझसे ।
मेथी - क्या बोल रहे हो । क्या आपको सच में इतनी पसंद आयी दीदी ।
कबीर - बोल पटवाएगा मुझसे या मैं तेरा ये कांड उगल दूं घर पे ।
मेथी - नही नही भैया ऐसा मत करना प्लीज ।
कबीर - तो बोल जल्दी ।
मेथी - पर वो तो बात भी नही करती किसी से सीधे मुँह ।
कबीर - वो मुझपे छोड़ ।
मेथी - ठीक है भैया । मगर करना क्या होगा ।
कबीर मेथी को समझाता है की उसे किस तरह उसकी दीदी के दिल में कबीर के लिए जगह बनानी है और वो दोनों कॉफ़ी पीके निकल पड़ते हैं ।
कबीर जब मेथी को घर छोड़ता है तो उसकी दीदी देख लेती है और आके पूछती है -
दीदी - ये सब क्या है और क्या हुआ इसे ।
कबीर - कुछ नही हुआ इसे बस मामूली सी चोटें हैं ठीक हो जाएंगी ।
दीदी - मगर ये चोटें लगी कैसे ।
कबीर - एक कार ने टक्कर मार दी थी मगर चिंता की कोई बात नही है । तुम इसे अंदर ले जाओ ।
दीदी - तुम.....
कबीर - हाँ तुम... अब मुझसे 10-15 साल बड़ी तो दिख नही रही हो, जो मैं आप बोलूं इसलिए तुम इसे अंदर ले जाओ और इसे आराम करने दो ।
कबीर मेथी को अपना ध्यान रखने का बोलके चला गया और मेथी भी अपनी दीदी के साथ अंदर आ गया ।
आइये अब आपको कुछ अन्य पात्रों और सहायक पात्रों से रूबरू कराएं ।

प्रताप नारायण चंद्रवंशी
(कहानी के सहायक पात्र)
शिक्षा मंत्री और मेरे मामा महेंद्र प्रताप सिंह के दोस्त ।

सुलोचना चंद्रवंशी
(कहानी की सहायक पात्र)
प्रताप नारायण चंद्रवंशी की पत्नी और ग्रहणी ।

मेथस्वी चंद्रवंशी
(कहानी का सहायक पात्र)
प्रताप और सुलोचना का बेटा । मुझसे 2 साल छोटा ।

अनंगवती चंद्रवंशी
प्रताप और सुलोचना की बेटी और मेथस्वी की बहन और मेथस्वी से 1 साल बड़ी ।
कातिलाना हुस्न की मालकिन । बड़े बड़े स्तन, पतली कमर, बढ़िया गांड और पूरे जिस्म से हर तरीके से कहर ढाती ।


IMG-20210212-235015
कबीर मेथी को छोड़के वहां से निकल गया क्योंकि उसे सारा के पास भी जाना था ।
सारा के पास जाने की जल्दी में वो मेथी से एक ज़रूरी बात करना तो भूल ही गया था और उसने तुरंत मेथी को फ़ोन लगाया ।
मेथी - हाँ भैया बोलो ।
कबीर - अबे तेरी दीदी का फ़ोन नंबर तो तूने दिया ही नही ।
मेथी - तो आपने माँगा ही नही था ।
कबीर - चल अब जल्दी से उसका नंबर भेज फ़ोन वाला भी और व्हाट्सएप वाला भी और साथ में उसकी फेसबुक आई डी और इंस्टाग्राम आई डी और जो जो भी हो सब भेज दे जल्दी ।
मेथी - जी भैया, मैं भेजता हूँ और थैंक यू आपने दीदी को कुछ नही बताया ।
कबीर - कोई बात नही । तेरे लिए इतना तो कर ही सकता हूँ ।
मेथी - मेरे लिए या मेरी दीदी के लिए ।
कबीर - चल ना... तू वो कर जो मैंने बोला है ।
मेथी - ठीक है भैया, मैं भेजता हूँ ।
कबीर ने फ़ोन रखा और गाड़ी भगानी शुरू की ।
इधर कबीर सारा के घर पहुंचा और उधर कबीर के फ़ोन पे मेथी का मैसेज आया ।
कबीर ने घंटी बजायी तो सारा ने दरवाज़ा खोला ।
सारा तो नहा के निकली थी और उसने तौलिया लपेट रखा था ।
सारा तो कबीर को देखके खुश हो गयी मगर कबीर बिना कुछ कहे सुने अंदर आ गया ।
कबीर अंदर आकर सोफे पे बैठा और सारा भी उसके पीछे पीछे चली आयी ।
कबीर सारा से बोला -
कबीर - सारू...
सारा - जी
कबीर - जाके कपड़े पहन के आ जा फिर कुछ काम है तुझसे । मुझे कुछ बात करनी है ।
सारा - जी
सारा कबीर से बात करके चली गयी मगर उसे कबीर कुछ बदला बदला लग रहा था ।
सारा अंदर गयी और तैयार होने लगी ।
उधर कबीर ने भी अपना फ़ोन निकाला और मेथी की दीदी को अनंगवती का नंबर सेव किया ।
नंबर सेव करने के बाद कबीर ने सोचा की क्यों ना इससे थोड़ी बात की जाये और कबीर ने उसे मैसेज भेजा ।
कबीर - इस खूबसूरत हुस्न की मल्लिका को मेरा प्यार भरा नमस्कार ।
इधर कबीर ने ये मैसेज भेजा और उधर एक लड़की अपने कमरे में बैठी थी और उसका मोबाइल बजा ।
उसने देखा की उसके मोबाइल में मैसेज आया था ।
उसने मैसेज को पढ़ा और ख़ुशी में बिस्तर से कूद गयी ।
उसे तो मैसेज पढ़के यकीन ही नही हुआ तो उसने उसे दुबारा पढ़ा और फिर सोचा की एक बार पक्का कर लूं और उनसे उसके जवाब में मैसेज भेजा ।
लड़की - तारीफ करने के लिए शुक्रिया ।
इधर वो लड़की शर्मा रही थी और उधर कबीर का फ़ोन बजा ।
कबीर ने झट से अपना फ़ोन देखा तो उसमे तमन्ना का मैसेज था ।
कबीर ने जैसे ही उसे पढ़ा उसके मुँह से निकला -
कबीर - अरे बहनचोद... ये मैंने क्या कर दिया ।
मुझे किसे मैसेज भेजना था और किसे भेज दिया ।
कबीर अपना सर पकड़ के बैठ गया ।
 

lovestar

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इधर कबीर अपना सर पकड़ के बैठा था तो उधर तमन्ना के मैसेज पे मैसेज आ रहे थे ।
तमन्ना - क्या हुआ...
तमन्ना - कहाँ चले गए...
तमन्ना - बात क्यों नही करते...
तमन्ना - नाराज़ हो गए क्या...
तमन्ना - प्लीज कुछ तो बोलो...
तभी सारा तैयार होके बाहर आयी । सारा तो हमेशा की तरह सुन्दर लग रही थी मगर कबीर अपनी इस नयी मुसीबत मैं खोया हुआ था और उसे सारा के आने का पता ही नही चला ।
सारा ने कबीर को देखा जो अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था तो उसने ज़ोर से खाँसा - उहूँ... उहूँ...
सारा की खाँसी ने कबीर की ख्याली दुनियाँ में खलल डाला और वो होश में आया ।
कबीर ने सारा को देखा और उसका हाथ पकड़ के उसे अपने पास सोफे पे बिठा लिया ।
सारा ने कबीर को देखा और कहा -
सारा - आप कुछ बात करने वाले थे । बोलिये ना क्या बात है ।
कबीर - मैं तुझसे फिर पूछता हूँ क्या तुझसे सच में मेरे साथ ये रिश्ता रखना है ।
सारा - जी.. ये क्या एक ही सवाल आप बार बार करते है ।
कबीर - मेरे सवाल का ये जवाब नही है ।
सारा - हाँ... मैं सच में ये चाहती हूँ ।
कबीर - ठीक है... मैं तुझे कुछ कागज़ दे रहा हूँ, पहले उन्हें ध्यान से पढ़ ले ।
सारा - कौन से कागज़ ।
कबीर अपनी गाड़ी से निकाल के कुछ कागज़ सारा को देता है और कहता है -
कबीर - ये ध्यान से पढ़ ले और आराम से सोच समझकर मुझे बता देना, मुझे कोई जल्दी नही है । तब तक मैं अंदर जा रहा हूँ लेटने ।
सारा - जी...
कबीर अंदर आराम करने चला जाता है और सारा उन कागज़ों को देखने लगती है ।
इधर कबीर बड़ी ही संजिदगी से चिंता में डूबा कुछ सोच रहा था तो उधर कागज़ों पे नज़र पड़ते ही सारा के होश उड़ गए और उसने अपने मुँह पे हाथ रखके बोला -
सारा - या अल्लाह....
सारा को अपनी आँखों पे यकीन नही हो रहा था ।
वो कभी कबीर को देखती जो बिस्तर पर आराम से लेटा हुआ था तो कभी उन कागज़ों को देखती ।

IMG-20210213-180419

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सारा जैसे जैसे इसे पढ़ती जा रही थी वैसे वैसे उसकी धड़कने बढ़ती जा रही थीं ।
उधर तमन्ना काफी उदास हो गयी थी । उसे जो ख़ुशी मिली थी वो पल भर में छिन गयी थी ।
कबीर ने तमन्ना के किसी भी मैसेज का कोई जवाब नही दिया था ।
वो अपनी सोच में गुम था । जैसे अपने अंदर कुछ टटोल रहा हो ।
वहीं मेथी के घर में सब परेशान थे । मेथी के बदले हुए कपड़े और उसके बदन पर चोटें कुछ अलग ही कहानी बयान करी रही थीं । किसी को भी उसके एक्सीडेंट की खबर पर विश्वास नही हो रहा था ।
अनंगवती उसे सहारा देके उसके कमरे में ले गयी और उसे बिस्तर पर लिटा के एक के बाद एक सवाल दागने शुरू किये ।
अनंगवती - वो लड़का कौन था ।
मेथी - अरे वो तो मेरे भैया थे ।
अनंगवती - भैया... कौन भैया... ये कहाँ से पैदा हो गया ।
मेथी - वो मेरे स्कूल में हैं । मेरे सीनियर हैं ।
अनंगवती - पहले तो तूने कभी बताया नही ।
मेथी - ये कैसा सवाल है । जैसे आपने पहले कभी पूछा ।
अनंगवती - और बता उसके बारे में । वो कहाँ रहता है, क्या करता है ।
मेथी - इतना सब क्यों पूछ रही हो । पसंद आ गया क्या ।
अनंगवती - तू बताता है की नही ।
मेथी - अच्छा अच्छा ठीक है मैं बताता हूँ ।
इस तरह अनंगवती मेथी से पूछती रही और मेथी उसे सब कुछ बताता रहा ।
अनंगवती - अच्छा अच्छा ठीक है । अब ये बता ये इतनी सारी चोटें कैसी लगी ।
मेथी - वो मेरा किसी से झगड़ा हो गया था और भैया उस वक़्त वहीं से गुज़र रहे थे और उन्होंने बचा लिया ।
अनंगवती - कैसा झगड़ा ।
मेथी - वो... वो...
अनंगवती - ये वो वो क्या लगा रखा है । ठीक से बोल ।
मेथी - वो मैंने एक से पैसे लिए थे और दे नही पाया तो वो...
अनंगवती - क्या.... पैसे.... कितने... क्यों...
मेथी - एक लाख
अनंगवती - क्या... एक लाख... क्यों...
मेथी - वो दोस्तों को पार्टी देनी थी ।
अनंगवती - आने दे पापा को । अब वो ही तुझे ठीक करेंगे ।
मेथी - नही दीदी... प्लीज... ऐसा मत करना... पापा मुझे मार डालेंगे...
अनंगवती - ये तो तुझे पहले सोचना था ना । रुक तू, पापा को आने दे मैं बताती हूँ की तू आज कल क्या करता है ।
अनंगवती की बात सुनके मेथी की तो हवा ही निकल गयी । उसे लगा आज वो बचेगा नही । उसने तुरंत अनंगवती के पैर पकड़ लिए और रोने लगा ।
वैसे अनंगवती को कबीर पहले ही पसंद आ गया था और मेथी से उसकी पूरी कुंडली जानने के बाद तो अनंगवती और ज़्यादा उसकी तरफ आकर्षित हो गयी थी ।
मेथी ने जैसे ही अनंगवती के पैर पकडे अनंगवती ने कुछ सोचा और मुस्कुराते हुए कहा ।
अनंगवती - पर मैं क्यों ना बताऊँ पापा को ।
मेथी - दीदी आप क्या चाहती हो मुझसे, बता दो । बस ये बात यहीं ख़त्म कर दो ।
अनंगवती - तो मिलवाएगा मुझे कबीर से, बोल ।
मेथी - मिलवा दूंगा ।
अनंगवती - बस मिलवाएगा, और कुछ नही ।
मेथी - आप बताओ और क्या करूँ ।
अनंगवती - उससे दोस्ती करवाएगा ।
मेथी - हाँ करवा दूंगा ।
अनंगवती - चल ठीक है । जा तुझे छोड़ दिया ।
मेथी - अब तो नही बताओगी पापा को ।
अनंगवती - नही
मेथी - थैंक यू दीदी ।
अनंगवती - और एक बात । आज के बाद कोई उलटे सीधे काम करेगा ।
मेथी - नही
अनंगवती - फालतू और घटिया लोगों से दोस्ती रखेगा ।
मेथी - नही
अनंगवती - कबीर को बताएगा की मैं उसे पसंद करती हूँ ।
मेथी - नही
अनंगवती - क्या...
मेथी - सॉरी दीदी... हाँ बताऊंगा...
अनंगवती - चल ठीक है तू आराम कर और मेरा काम याद से कर देना वरना पापा तुझे बहुत मारेंगे ।
मेथी - कर दूंगा दीदी ।
अनंगवती मेथी से बात करके चली गयी ।
दूसरी तरफ सारा ने सारे कागज़ पढ़ लिए और कबीर की तरफ देखा मगर कबीर तो सो रहा था ।
सारा ने बहुत देर तक कुछ सोचा और उठके अंदर चली गयी और कबीर से चिपक सो गयी ।
शाम को ज़ब सारा की नींद खुली तो वो उठी और मुँह हाथ धोकर बाहर आ गयी ।
थोड़ी ही देर में कबीर भी उठके आ गया और वो बाहर जाने लगा ।
कबीर ने जाते जाते सारा से कहा -
कबीर - मैं चलता हूँ । तू जब सोच ले तो मुझे मैसेज कर देना ।
कबीर ये बोलके जाने लगा तभी सारा ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे रोकते हुए कहा -
सारा - मुझे क़ुबूल है ।
कबीर - ठीक है । अगर तुझे क़ुबूल है तो उन कागज़ों पे दस्तखत कर दे ।
सारा ने उन कागज़ो पे दस्तखत किये और कबीर को दे दिए ।
तभी बाहर अचानक से बहुत तेज़ बिजली कड़की और बदल गरजने लगे ।
बाहर का मौसम खराब हो रहा था । शायद कोई बड़ा तूफ़ान आने वाला था और ये तूफ़ान इनके शहर में ही नही इनकी ज़िन्दगीयों में भी आने वाला था जो शायद सबकी ज़िन्दगीयों को तबाह करने वाला था ।
 

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कबीर ने सारा से दस्तखत कराने के बाद वो कागज़ लिए और उन्हें अपनी गाड़ी में रख दिए और सारा के पास आया ।
कबीर ने सारा से कहा -
कबीर - देख सारा... मेरी बात ध्यान से सुन । मैं जो आज बोलूंगा उसे दुबारा नही बोलूंगा, समझी ।
सारा - जी
कबीर - सबसे पहली बात तो ये की मुझे ना सुनने की आदत नही है इसलिए मैं आज के बाद तुझे जो भी कहूंगा, तुझे वो उसी वक़्त मानना पड़ेगा, बिना कोई सवाल किये और बिना किसी देरी के ।
सारा - जी
कबीर - मैं जो भी बोलूं करने ले लिए, तू उसे बिना कुछ सोचे और बिना किसी झिझक के उसी वक़्त करेंगी ।
सारा - जी
कबीर - मुझे इस बात से कोई मतलब नही है की तू अकेली है या किसी के साथ में है, घर में है या बाहर है । मैं तुझे जब भी फ़ोन करूँ, तुझे एक ही बार में और एक ही घंटी में उठाना होगा ।
सारा - जी
कबीर - आज के बाद तू मुझे सिर्फ मालिक कहकर बुलाएगी । और तुझे मुझसे सवाल करने की इजाज़त नही होगी ।
सारा - जी मालिक
कबीर - मुझसे पूछे बगैर आज के बाद तू कोई काम नही करेंगी । तू मुझसे हर काम से पहले इजाज़त लेगी और मैं कहूंगा तो ही करेंगी और मैं मना करूँ तो नही करेंगी ।
सारा - जी मालिक
कबीर - आज के बाद तेरी हर चीज़ मेरी होगी और मैं समय समय पर तेरा मोबाइल भी देखूंगा ।
सारा - जी मालिक
कबीर - आज के बाद तुझे कब क्या खाना है, कब क्या पहनना है, कब सोना है, सब मैं तय करूँगा ।
सारा - जी मालिक
कबीर - अभी के लिए इतना ही काफी है । समय आने पर और भी बातें बताऊंगा ।
सारा - जी मालिक
कबीर - चल अब तेरे उस किराए के कमरे से तेरा सामान भी लाना है । आज के बाद तू इसी घर में रहेगी ।
सारा - जी मालिक
कबीर - ठीक है, फिर चल जल्दी ।
कबीर सारा को लेके चला गया और उसके कमरे से सारा सामान लेके वापस आ गया ।
कबीर ने सारा को अपना सारा सामान ज़माने को बोला ।
सारा तुरंत अपना सारा सामान जमाने लगी ।
सारा अपना सब सामान जमा के कबीर के पास वापस आयी तो कबीर बोला -
कबीर - सारा, सबसे पहले तू अपने सारे कपड़े लेके आ मेरे पास और ये बक्सा ले जा इसी में डाल के ले आ ।
कबीर ने सारा को गत्ते का एक बड़ा सा बॉक्स दिया ।
सारा ने फटाफट जाके अपने सारे कपड़े उसमें डाले और लेके कबीर के पास आ गयी ।
कबीर ने वो बॉक्स लिया और बोला -
कबीर - डाल दिए सारे कपड़े ।
सारा - जी
कबीर - बुर्क़ा, हिजाब, ब्रा, पैंटी सब कुछ ।
सारा - जी
कबीर - ठीक है, अभी देखता हूँ ।
कबीर ने बॉक्स को देखना शुरू किया और उसमें से उसने सारा की दो पैंटी बाहर निकाली ।
ये सब सारा की समझ से परे था । वो बस हैरानी से देख रही थी जो भी हो रहा था ।
कबीर ने सारा की दोनों पैंटी निकाल के एक तरफ रखी और सारा से बोला ।
कबीर - आज कितने कपड़े पहने हुए है ।
सारा - मालिक, सलवार कुर्ता और ब्रा पैंटी ।
कबीर - चल वो ब्रा पैंटी भी दे मुझे जल्दी ।
सारा ने फटाफट अपने कपड़े उतारे और अपनी ब्रा पैंटी उतार के कबीर को दी ।
कबीर ने वो ब्रा पैंटी भी उस बॉक्स में डाली और उस बॉक्स को लेके वो बाहर चला गया ।
सारा उसे जाते हुए देखती रही ।
कबीर ने वो बॉक्स घर के बाहर बने गार्डन में मैं गेट के पास रखा और सारा को बुलाया ।
कबीर ने सारा को अपना लाइटर दिया और कहा -
कबीर - सारा, ये ले लाइटर और आग लगा दे इस बॉक्स को ।
कबीर की ये बात सुनके सारा के तो प्राण ही सुख गए थे । वो सोच रही थी की कबीर उसके सारे कपड़ों में आग लगवा देगा तो वो पहनेगी क्या ।
कबीर ने सारा को देखा और कहा -
कबीर - मुझे इंतेज़ार पसंद नही है । वैसे भी तू कपड़े पहनके अच्छी नही लगती । तेरा ये रूप ही सबसे ज़्यादा सुन्दर है ।
सारा ने कबीर से लाइटर लिया और जल्दी से उस बॉक्स को आग लगा दी और अपने सभी कपड़ों के जलते हुए जनाज़े को देखती रही ।
कबीर ने सारा को देखा और कहा -
कबीर - ये कपड़ों के लिए उदास होने की कोई ज़रूरत नही है । वैसे भी ये किसी काम के नही थे । जो कपड़े तेरे इस खूबसूरत नंगे बदन को छुपाएं उन्हें तो बहुत पहले जल जाना चाहिए था । और हाँ आज पहली गलती की है तो छोड़ रहा हूँ, दुबारा ऐसा किया तो तुझे नंगी घर से निकाल दूंगा, फिर सब सोचना भूल जायेगी, समझी ।
सारा - जी मालिक... दुबारा गलती नही होगी ।
कबीर - और हाँ वो दो पैंटी अंदर पड़ी हैं उन्हें संभाल के रख ले वो तेरे महीने के उन दिनों के लिए है ।
सारा - जी मालिक
सारा अंदर गयी और उसने अपनी दोनों पैंटी अलमारी में रखी और वापस आ के बोली -
सारा - रख दी मालिक ।
कबीर - आज से तू घर में नंगी रहेगी । मैं ज़ब भी आऊं तो ऐसे ही मिलेगी । तुझे सिर्फ सोते समय अपना नंगा बदन ढाकने की इजाज़त है वो भी चादर से या रजाई से और बाथरूम में जो तौलिया है उसका इस्तेमाल सिर्फ बदन का पानी पोछने के लिए है । ख़बरदार जो उसे कभी लपेटा अपने बदन पर ।
सारा - जी मालिक
कबीर - अब जा और नहा ले और सुन, अपनी चूत भी पूरी चिकनी कर लेना । ये क्या सतपुड़ा का जंगल उगा रखा है । तब तक मैं जाके रात के लिए खाना लेके आता हूँ ।
और ये बोलकर कबीर बाहर चला गया और सारा भी घर के अंदर आ गयी और नहाने चली गयी ।
कबीर वहां से निकला और सबसे पहले एक कपड़े की दूकान में गया । वहां जाके वो दुकानदार से बोला -
कबीर - मुझे एक स्कर्ट चाहिए जिसकी लम्बाई एड़ी तक हो ।
दुकानदार - जी सर... आप मेरे साथ आइये ।
और दुकानदार ने कबीर को काफी सारी स्कर्ट दिखाई । कबीर ने उसमें से दो स्कर्ट पसंद की जो की बिलकुल प्लेन थीं और दोनों ही सफ़ेद थीं । स्कर्ट पसंद करने के बाद कबीर बोला -
कबीर - आपके पास खिमार होगा ।
दुकानदार - जी सर ।
दुकानदार ने कबीर को कई तरह के खिमार दिखाए और कबीर ने उनमें से दो खिमार पसंद किये जो की प्लेन और सफ़ेद थे । उन खिमार की लम्बाई जाँघो तक थी और साथ में उनकी पूरी बाँह की आस्तीने थीं ।
खिमार एक ख़ास तरह का हेडस्कार्फ है मुसलमान लड़कियां या औरतें पहनती है जो उनके सर से शुरू होकर नीचे तक जाता है ।
कबीर ने दोनों खिमार और स्कर्ट खरीदे और वहां से निकल गया और रास्ते से खाना पैक करा के वो घर आ गया ।
सारा नहाने के बाद कबीर की राह देख रही थी और कबीर के आते ही वो उसके पास चली गयी ।
कबीर ने सारा को खाना दिया और कहा -
कबीर - सारु, खाना लगाओ मैं मुँह हाथ धोके आता हूँ ।
सारा के जाते ही कबीर ने सारा का फ़ोन लिया और उसमें एक स्पाईवेयर सॉफ्टवेयर डाला और उसकी कुछ सेटिंग्स की । अब कबीर सारा के फ़ोन की हर गतिविधि पे नज़र रख सकता था और उसके फ़ोन को कहीं से भी बैठके अपने हिसाब से चला सकता था । और सारा को ये बात का कभी पता भी नही चलने वाली थी ।
कबीर मुँह हाथ धोके आया और उसने सारा के साथ मिलके खाना खाया ।
खाना खाने के बाद कबीर ने सारा का मोबाइल लिया और उसमें एक पोर्न साइट खोल के दी और कहा -
कबीर - ये आज रात भर में अच्छे से देख ले और समझ ले की चुदाई कैसी होती है और चुदाई में क्या क्या होता है । कल से तेरे इस नए जीवन की शुरुआत है और कल ही तेरी चुदाई भी होगी ।
सारा - जी मालिक ।
कबीर - मैं रात में तो नही रुकूंगा, मुझे जाना है । मेरा एक परिवार भी है और उसे भी देखना है । मैं सुबह आऊंगा और याद रखना ये सारे वीडियो अच्छे से देख लेना । चल मैं जा रहा हूँ, आके दरवाज़ा बंद करले ।
सारा - जी मालिक ।
कबीर वहां से निकल गया और सारा कबीर के बताये काम पे लग गयी ।
कबीर निकल तो गया था और उसे जाना भी मामा के घर ही था मगर उसने गाड़ी मोड़ दी और अपने घर चला गया । उसका असली घर जहाँ वो कामीनी और स्वीटू के साथ रहता आया था ।
कबीर ने अंदर आके एक बढ़िया सी स्कॉच की बोतल उठाई और पीने लगा ।
शराब पीते पीते उसने अपना मोबाइल निकला और सोचा की चलो देखते हैं सारा क्या कर रही है ।
उसे अपने उस सॉफ्टवेयर की मदद से देखा की सारा उसके बताये काम के अनुसार चुदाई के वीडियो देखने में व्यस्त थी ।
कबीर ने कुछ देर उसे देखा फिर बंद कर दिया ।
अब उसे कुछ भी समझ नही आ रहा था की वो क्या करे । मामा के घर जाने का मन नही था और वैसे भी उधर तमन्ना थी तो उसकी जान खा लेती तो उसने वहां ना जाने का मन बना लिया ।
उसने फ़ोन लगाके कुछ देर कामीनी से बात की और सारा हाल चाल लिया और फिर शराब पीते हुए टी वी देखने लगा ।
वही मेथी के घर उसके पापा यानी प्रताप नारायण चंद्रवंशी आ गए थे और उन्हें मेथी के हादसे के बारे में पता चला । उन्होंने सारी बात पता की और कबीर को अपने घर मिलने के लिए बुलाने को बोला ।
कबीर अभी टी वी देख रहा था की उसके पास अनंगवती का फ़ोन आया ।
कबीर ने फ़ोन उठाया और बात शुरू की -
कबीर - हाँ बोलो...
अनंगवती - मैं अनंगवती बोल रही हूँ, मेथी की बहन ।
कबीर - हाँ मुझे मालूम है । बोलो क्या बात है ।
अनंगवती - तुम्हे कैसे पता चला । और मेरा नंबर तुम्हे कैसे मिला ।
कबीर - क्या ये सब जानने के लिए फ़ोन किया है क्या । काम की बात करनी है तो करो नही तो मैं चला ।
अनंगवती - अरे सुनो तो... वो पापा ने तुम्हे बुलाया है ।
कबीर - क्यों... तुम्हारी शादी करानी है क्या मुझसे ।
अनंगवती - तुम सीधे सीधे बात नही कर सकते क्या ।
कबीर - अच्छा बोलो । क्यों बुलाया है ।
अनंगवती - वो तुमसे मिलना चाहते हैं । तुमने मेथी की जान बचायी ।
कबीर - फिर तो उनको बोल दो की मैं नही आने वाला । हाँ.. अगर तुम बुला रही हो मुझे मिलने के लिए तो शायद आ भी जाऊं ।
अनंगवती - मैं क्यों मिलूंगी तुमसे ।
कबीर - तो ठीक है रख दो फ़ोन । मैं कहीं नही आने वाला ।
अनंगवती - अरे... पहले ये बताओ तुम्हे मुझसे क्यों मिलना है ।
कबीर - तुम कोई छोटी बच्ची हो क्या । तुम्हे नही पता की लड़का लड़की क्यों मिलते हैं ।
अनंगवती - तुम ज़्यादा तेज़ नही चल रहे हो ।
कबीर - मुझे धीरे चलने की आदत नही है ।
अनंगवती - तो तुम आओगे या नही ।
कबीर - तुम बुला रही हो या तुम्हारे पापा ।
अनंगवती - मेरे पापा ।
कबीर - तब तो फिर भूल जाओ ।
अनंगवती - अच्छा मुझसे भी मिल लेना बस ।
कबीर - ठीक है कल रात में आता हूँ ।
अनंगवती - रात में क्यों ।
कबीर - तुमसे मिलने का मज़ा रात में ही आएगा ।
अनंगवती - फिर उलटी बात ।
कबीर - तो रहने दो ना । मैं नही आता फिर ।
अनंगवती - अरे यार... तुम बहुत ज़िद्दी हो । ठीक है आ जाना रात में ।
कबीर - और हाँ... रात में मैं वहीं रुकूंगा ।
अनंगवती - अब ये क्या है ।
कबीर - ठीक है... मैंने अब कोई बात नही करनी । तुम जानो और तुम्हारे पापा जाने । और अब फ़ोन नही करना ।
ये बोलके कबीर ने फ़ोन रख दिया ।
उधर अनंगवती उसे फ़ोन करती रही और कबीर ने कोई बात नही की ।
फिर अनंगवती ने मैसेज किया -
अनंगवती - ठीक है... तुम आ जाना और मैं तुम्हारे रात में रुकने का इंतज़ाम कर दूंगी ।
कबीर - रात में रुकने का इंतज़ाम अपने ही कमरे में करना ।
अनंगवती कुछ देर सोचती रही फिर मैसेज किया -
अनंगवती - ठीक है... अब तो आओगे या नही ।
कबीर - हम्म... कल मिलता हूँ रात में ।
अभी अनंगवती से बात करके कुछ ही देर हुई थी की स्वीटू ने कबीर को फ़ोन किया ।
कबीर ने फ़ोन उठाया और बोला -
कबीर - हाँ बेटू... बोल...
स्वीटू - आप कहाँ छोड़ के चले गए मुझे... आपकी बहुत याद आ रही है ।
कबीर - तो बोल क्या करूँ...
स्वीटू - आ जाओ ना मेरे पास ।
कबीर - अभी तो थोड़ा मुश्किल है बेटू ।
स्वीटू - क्यों क्या हुआ ।
कबीर - कुछ ज़रूरी काम में उलझा हुआ हूँ और कल स्कूल भी जाना है । तू एक काम कर... आज रात गुज़ार ले और कल सुबह तू कामीनी के साथ घर आ जाना ।
स्वीटू - लेकिन बताओ तो क्या बात है ।
कबीर - तू भूल गयी क्या वो बात ।
स्वीटू - नही... कभी नही...
कबीर - तो ठीक है... फिर मुझे थोड़ा टाइम दे और मुझे जो करना है उसे करने दे । तुझे जो चाहिए वो तुझे मिल जायेगा ।
स्वीटू - ठीक है ।
स्वीटू ने फ़ोन रखा और वो सोने चली गयी ।
उधर कबीर ने एक बार फिर सारा का मोबाइल चेक किया । उसने सारे के मोबाइल का कैमरा चालू किया और देखा सारा तो नंगी अपने पैर फैलाये सो रही थी और उसके मोबाइल में अभी भी चुदाई की वीडियो चल रही थी ।
कबीर ने भी अपना फ़ोन रखा और सोने चला गया ।
 

lovestar

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कबीर सुबह उठा और सारा घर गया ।
सारा उठ चुकी । कबीर ने उसे उसका सलवार कुर्ता दिया जो कल बचा लिया था और उसे नहाने भेज दिया ।
सारा नहा के और तैयार होके आयी और दोनों चाय पीके निकल गए ।
स्कूल में जाके उसने सारा को अपनी क्लास में बुलाया और दरवाज़ा बंद करके उसपे टूट पड़ा ।
सारा कुछ कहना चाहती थी मगर बोल नही सकती थी तो उसकी हालत देखके कबीर बोला -
कबीर - अभी सवाल जवाब नही । अभी वक़्त कम है हमारे पास ।
और ये बोल के कबीर ने सारा के होंठों पे अपने होंठ रख दिए और चूसना शुरू किया ।
सारा ने भी उसका साथ देना शुरू किया । अब दोनों ही एक दूसरे के होठों को चूसने में लगे हुए थे ।
कबीर सारा के होठों को चूसता भी जा रहा था और साथ ही साथ उसके स्तनों को निचोड़ता भी जा रहा था ।
सारा के मुँह से उम्म... उम्म... की आवाज़ें निकल रही थीं । सारा ने कबीर के हाथ के ऊपर अपना हाथ रखा और खुद ही अपने स्तनों को दबाने लगी ।
सारा की इस मस्ती से कबीर भी मस्त हुआ जा रहा था । उसने तुरंत अपने होंठ अलग किये और सारा के कुर्ते को निकाल फैका ।
सारा अपने कुर्ते को दूर जाके गिरते हुए देखती रही ।
कबीर ने एक हाथ से सारा के स्तन को पकड़ के दबाना शुरू किया तो दूसरे स्तन पे अपने दाँत से उसकी चूची पकड़ के खींचना शुरू किया ।
सारा कबीर के सर पे हाथ फेरके आह.. आह.. करने लगी और अब उसकी चूत भी पानी छोड़ने लगी ।
सारा ने अपने हाथ नीचे ले जाके कबीर की पेंट खोली और उसके खड़े हो चुके लौडे को बाहर निकाला ।
कबीर का लंड किसी भट्टी की तरह गरम हो रहा था ।
कबीर और सारा दोनों ही उत्तेजना में मरे जा रहे थे । इस तरह स्कूल में और वो भी अपनी ही क्लास के अंदर अपनी हवस को शांत करते हुए एक अलग की आनंद को महसूस कर रहे थे ।
दोनों ही एक अलग दुनियाँ में पहुँच गए थे ।
इधर सारा कबीर का लंड सहला रही थी तो उधर कबीर उसके स्तनों को नोंचने और काटने में लगा हुआ था ।
सारा अब पहले से ज़्यादा तेज़ आवाज़ में आअह्ह्ह... अह्ह्ह.... ओह्ह्ह... कर रही थी ।
सारा के स्तनों का पूरा नक्शा बिगाड़ने के बाद कबीर ने सारा को अलग किया और उसे नीचे बैठते हुए बोला -
कबीर - चल अब जल्दी से अच्छे ग़ुलाम की तरह अपने होठों का कमाल दिखा ।
सारा ने भी नीचे बैठके अपनी जीभ निकाल के कबीर के लंड को चाटना शुरू किया । कभी वो उसके टोपे को चाटती तो कभी ऊपर से नीचे तक अपनी जीभ से उसके पूरे लंड को चाटती और फिर उसके लंड को मुँह में लेके चूसने लगी ।
कबीर ने भी उसके सर को पकड़ के अपनी कमर से धक्के लगाते हुए उसका मुँह चोदना शुरू किया ।
कबीर तो जैसे पागल हुआ जा रहा था और मस्ती में बड़बड़ाता जा रहा था ।
कबीर - ओह्ह.. सारू... कितनी प्यारी ग़ुलाम है तू... आह्ह.. मज़ा आ गया... मैं तो सोचता हूँ की आज के अपना लंड अपनी चड्डी में डालने की जगह तेरे मुँह में ही डाले रहूँ... उउउफ्फ्फ....
कबीर ने कुछ देर सारा का मुँह चोदने के बाद अपना लंड निकाला ।
कबीर के लंड निकालते ही सारा ज़ोर ज़ोर से हाँफने लगी और उसका थूक निकल के नीचे गिरने लगा ।
कबीर ने सारा के गाल पे एक प्यार से थप्पड़ मारा और कहा -
कबीर - आजा मेरी ग़ुलाम अब तेरी चुदाई करता हूँ ।
सारा जैसे ही खड़ी हुई कबीर ने उसकी सलवार को खोल के निकाला और उसे भी कुर्ते की तरह उछाल दिया ।
सलवार भी दूर जाके कुर्ते के पास गिरी ।
अब सारा अपनी ही क्लास में पूरी नंगी खड़ी थी और नीचे स्कूल के ग्राउंड में सब बच्चे असेंबली में लगे हुए थे ।
कबीर ने सारा का एक पैर उठाके अपने कंधे पे रखा और अपनी जीभ निकाल के सुररर... की आवाज़ के साथ सारा की पूरी चूत को चाटा ।
सारा की गीली चूत पे कबीर जी जीभ लगते ही सारा उछल पड़ी और उसका संतुलन बिगड़ गया ।
अपने आपको गिरने से बचाने के लिए सारा ने सारा ने जल्दबाज़ी में कबीर के बालों को कस के पकड़ लिया जिसका नतीजा कुछ ऐसा हुआ की कबीर का मुँह और अंदर तक सारा की चूत में घुस गया और उसकी जीभ सारा की चूत में समा गयी ।
कबीर मज़े से अपनी जीभ सारा की चूत में डाल के उसे चाटने में लगा हुआ था और सारा भी अपनी कमर हिलाते हुए अपनी चूत को कबीर के मुँह पे रगड़ रही थी ।
सारा लगातार उम्म्म... उम्मम... ओह्ह्ह... ओह्ह्ह... कर रही थी ।
कबीर ने कुछ देर तक सारा की चूत से बहता उसका रस चाटा और फिर खड़ा हो गया उसकी चुदायी के लिए ।
कबीर ने फटाफट अपने बचे हुए कपड़े उतारे और अपने लंड को हाथ में पकड़ के सारा की चूत पे रखा । कबीर अपने लंड को सारा की चूत में डालने ही वाला था की तभी दरवाज़े की खटखटाने की आवाज़ आयी ।
इस आवाज़ से सारा की हालत ख़राब हो गयी और थोड़ा सा डर तो कबीर को भी था ।
सारा को लगा की आज तो उसकी इज़्ज़त भी गयी और नौकरी भी । वो सोच रही थी की मैं इस हालत में किसी को क्या जवाब दूंगी की मैं यहाँ अपने बच्चों को पढ़ाने आती हूँ या उनसे चुदवाने ।
वहीं कबीर सोच रहा था की क्या किया जाए ।
तभी उसने सारा से कहा -
कबीर - ग़ुलाम जल्दी बाहर जाके देख कौन है ।
कबीर की बात सुनके तो सारा की सांस ही रुक गयी ।
सारा डरते डरते अपने कपड़े उठाने के लिए गयी तो कबीर ने उसका हाथ पकड़ के खींचा और कहा -
कबीर - तुझे समझ में नही आता है क्या । मैं दरवाज़े के बाहर कौन है वो देखने के लिए बोल रहा हूँ और तू अंदर कहाँ जा रही है । चल ग़ुलाम जल्दी जाके देख कौन है बाहर ।
अब तो सारा के पसीने छूटने लगे । उसने जाके काँपते हुए हाथों से दरवाज़ा पकड़ा और कबीर को देखा ।
कबीर उसे घूर रहा था तो सारा ने भी डरते डरते दरवाज़ा खोला और अपना मुँह बाहर निकाल के देखा तो उसे वहां कोई दिखाई नही दिया और पूरा स्कूल अभी भी नीचे असेंबली में था ।
सारा ने थोड़ी सी राहत की सांस ली और कबीर से कहा -
सारा - कोई नही है मालिक, शायद हवा से हुआ होगा ।
सारा की बात सुनके कबीर की भी जान में जान आयी और उसने भी बाहर आके देखा ।
कबीर ने सारा से कहा -
कबीर - देख सब बच्चे और टीचर कैसे नीचे खड़े हैं । और यहाँ तू और मैं ऊपर चुदाई का मज़ा ले रहे हैं ।
कबीर ने सारा का हाथ पकड़ के उसे बाहर गलियारे की दीवार के सहारे खड़ा किया और कहा -
कबीर - सुन ग़ुलाम अब तेरी चुदाई यहीं होगी और तू आराम से चुदाई के मज़े लेती हुई नीचे देख और असेंबली का भी मज़ा ले । और हाँ मुँह बंद ही रखना अपना, नही तो पूरा स्कूल आज तेरी चुदाई देख लेगा, समझी ।
सारा ने डरते डरते सिर्फ हाँ में सर हिलाया और कबीर ने सारा के पीछे जाके उसे कमर से झुका के उसके पैर फैलाये और अपना लंड उसकी चूत पे रखा ।
कबीर ने एक हाथ से उसकी कमर को पकड़ा और दूसरे हाथ से उसके मुँह को बंद किया और धीरे धीरे अपना लंड उसकी चूत में डालने लगा ।
सारा दर्द से छटपटाने लगी मगर कबीर अपने लंड को दबाते हुए अंदर डालता ही रहा ।
अचानक से कबीर ने एक हल्का सा झटका मारा और सारा की चूत की झिल्ली को फाड़ के उसे आज एक लड़की से औरत बना दिया ।
सारा की चूत फटते ही उसे बड़ा दर्द हुआ मगर मुँह बंद होने से वो चीख नही पायी । सारा की बस दबी हुई आवाज़ निकली... ऊऊऊ... उम्म्म... और इसके साथ उसके आंसू भी बह निकले ।
वहीं कबीर अपने लंड को दबाते हुए सारा की चूत में पूरा डाल चूका था और अब एक हाथ से उसका मुँह बंद किये और दूसरे हाथ से उसके स्तनों को दबा रहा था उन्हें सहला रहा था ।
सारा का दर्द धीरे धीरे काम हो रहा था और उसने अपना हाथ ले जाके कबीर के हाथ पे रखा और कबीर के हाथ को सहलाने लगी ।
कबीर समझ गया और उसने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किये ।
सारा को हलके दर्द के साथ अब मज़ा भी आने लगा था और उसकी चूत में खुजली सी होने लगी थी । वो खुद भी कबीर के धक्के के साथ अपनी कमर आगे पीछे करने लगी ।
कबीर ने जैसे ही ये देखा उसने धक्के लगाने बंद कर दिए । कबीर के एकदम से रुक जाने की वजह से सारा ने हड़बड़ाके कबीर की तरफ देखा और उसे आँखों ही आँखों में अपनी चुदाई की भीख मांगी ।
जब कबीर ने कोई हरकत नही की तो सारा ने खुद ही अपनी कमर हिला के धक्के मारने शुरू किये और खुद ही कबीर से चुदने लगी ।
कबीर सारा की गांड को सहला रहा था और उसे कस के दबा रहा था ।
सारा को अब मज़ा आने लगा और उसके मुँह से दुबारा उम्म... उम्म... की सिसकियाँ निकलने लगी ।
कबीर ने ये देख, सारा की कमर को पकड़ा और रफ़्तार बढ़ाते हुए धक्के मारने लगा ।
उधर पूरा स्कूल सारा की आँखों के नीचे खड़ा था और वो बिना किसी की परवाह किये मज़े से चुद रही थी और अपनी चुदाई का आनंद ले रही थी ।
सारा की उम्म... उम्म... अब आह... आह... ओह्ह... ओह्ह... मैं बदल गयी थी ।
कबीर सारा को चोदते हुए कभी उसकी गांड दबाता तो कभी उसके स्तन और देखते ही देखते कुछ देर की चुदाई में सारा अपने चरम सुख पर पहुँचने लगी थी ।
कबीर ने अपने एक हाथ से अब सारा की चूत को सहलाना शुरू किया और पीछे से धक्के भी तेज़ कर दिए ।
सारा अब और तेज़ चिल्ला रही थी ।
सारा - आह... मालिक... ऐसे ही चोदो... मज़ा आ गया... ओह्ह्ह... मालिक... उफ्फ्फ... मुझे एक औरत बना दिया... बस ऐसे ही दिन रात चोदो... उम्म्म... आह...
कबीर भी पागलों की तरह उसे चोदने में लगा हुआ था । पूरे गलियारे में उनकी चुदाई की फच फच... की आवाज़ें और सारा की आह... उम्म... की सिसकियाँ गूँज रही थी ।
जैसे ही असेंबली की घंटी बाजी वैसे ही सारा की चूत ने झड़ना शुरू किया ।
सारा - ओह्ह्ह... मालिक... मैं गयी... कुछ निकल रहा है... आह... उम्म्म... अल्लाह... ये कैसी जन्नत है... उफ्फ्फ...
सारा की चूत ने ज़ब सारा पानी निकाल दिया उसके बाद सारा की नज़र नीचे पड़ी ।
नीचे सारे बच्चे और टीचर्स अपनी अपनी क्लास के लिए जाने लगे थे ।
उधर कबीर अभी भी धक्के लगा रहा था ।
सारा ने बड़ी हिम्मत करके बोला -
सारा - मालिक सब लोग निकल चुके हैं । कभी भी ऊपर आ जायेंगे ।
इधर सारा ने ये बोला उधर कबीर ने अपने वीर्य की धार मारनी शुरू की और उसकी पूरी चूत भरते ही वो उससे अलग हुआ और उसे लेके क्लास में भगा ।
क्लास में आते ही उसने सारा को उसके कपड़ों के साथ क्लास के एक कोने में बने स्टोर रूम जैसे कमरे में भेजा और खुद भी फटाफट कपड़े पहन के बाहर निकल गया ।
उधर कबीर के बाहर जाते ही सारा भी स्टोर रूम से बाहर आयी और अपनी टेबल पे जाके बैठी ही थी की बच्चे अंदर आने लगे ।
सारा ने मन में सोचा की आज तो बाल बाल बच गए । या अल्लाह... तेरा शुक्र है ।
तभी कबीर भी वापस आ गया और अपनी सीट पे बैठ गया ।
और सारा ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया ।
बच्चों को पढ़ाते पढ़ाते सारा उठी और बोर्ड पे जाके कुछ लिखने लगी तो उसे ध्यान अपनी हालत पे गया और उसे इतनी शर्म आयी की कुछ पलों के लिए उसने लिखना ही छोड़ दिया ।
सारा के लिखने से उसके बड़ी बड़ी छातियाँ उसके दोनों स्तन गोल गोल घूमने लगे ।
उसे लगा की क्लास में अगर किसी को पता चल गया की वो बगैर ब्रा पहने पढ़ा रही है तो वो क्या मुँह दिखाएगी । मगर उसके पास कोई चारा नही था और उसने बोर्ड पे लिखना शुरू किया और उसके लिखते ही उसके स्तन एक बार फिर उछलने लगे ।
सारा को इस वक़्त डर भी लग रहा था और शर्म भी आ रही थी पर कहीं ना कहीं उसे डर और शर्म से ज़्यादा मज़ा आ रहा था जिससे उसकी चूत जो पहले ही कबीर के वीर्य से भारी थी वो फिर से बहने लगी और उसकी बहती हुई चूत का पानी उसकी जाँघो तक आ रहा था ।
सारा ने जल्दी जल्दी अपना लिखना ख़त्म किया और वो बैठने लगी तभी कबीर ने उसे मैसेज किया ।
कबीर - मेरे ग़ुलाम को चुदाई कैसी लगी
सारा - बहुत अच्छी थी मालिक ।
कबीर - तो दुबारा कब चुदेगी ।
सारा - जब आप बोलो मालिक ।
कबीर - चल मेरे पास आजा ।
सारा - मालिक मगर बच्चे...
कबीर - वो तू देख ।
सारा - जी मालिक ।
सारा के बच्चों को रिवीज़न करने का बोला और कबीर के पास चली गयी ।
सारा जैसे ही कबीर के पास गयी वैसे ही कबीर ने उसके स्तन को ज़ोर से मसल दिया ।
सारा ने बड़ी मुश्किल से अपनी चीख रोकी ।
वैसे कबीर हमेशा सबसे आख़री में बैठता था तो किसी को कुछ पता नही चलना था मगर फिर भी सारा को थोड़ा बहुत डर तो था ही की कबीर ना जाने क्या करेगा ।
और हुआ भी वही जिसका सारा को डर था ।
कबीर ने जल्दी से अपना हाथ सारा की सलवार में डाल दिया और उसकी चूत पे रख दिया ।
अपनी चूत पे कबीर का हाथ पड़ते ही सारा चौंक गयी और उनसे बाकी बच्चों को देखा ।
सब बच्चे पड़ने में लगे थे तो सारा कबीर के थोड़ा पास आ गयी और उसने अपनी सलवार थोड़ी नीचे कर दी ।
कबीर अब उसकी चूत से अच्छे से खेल रहा था और उसे सहला रहा था ।
सारा भी बार बार बच्चों को देख रही थी और कबीर की मस्ती का मज़ा भी ले रही थी ।
कबीर को भी सारा को यूँ परेशान करने में मज़ा आ रहा था । उसने अच्छे से उसकी चूत पे ऊँगली चला के उसे गरम किया और तुरंत अपना हाथ निकाल लिया । सारा इतनी गरम हो गयी थी की कबीर का इस तरह छोड़ देना वो सह ना पायी और उसका हाथ पकड़ के वापस अपनी चूत पे रखने लगी मगर कबीर ने हाथ हटा लिया ।
सारा ने कबीर से मिन्नत की -
सारा - मालिक आपके हाथ जोड़ती हूँ । ऐसे मत तड़पाओ ।
कबीर - तो क्या करूँ ।
सारा - करो ना मालिक जो पहले कर रहे थे ।
कबीर - क्यों करूँ ।
सारा - मैं मर जाउंगी मालिक । मेरी चूत में जलन होने लगी है ।
कबीर - चल ठीक है । अपनी सलवार खोल ।
सारा - मालिक...
कबीर - सलवार खोलने को बोला है, उतारने को नही । वैसे भी तेरा कुर्ता काफी लंबा है । चल जल्दी कर ।
सारा ने फटाफट अपनी सलवार खोली और कबीर की टेबल से अपनी जाँघे चिपका के खड़ी हो गयी ।
कबीर ने उसका कुर्ता थोड़ा सा सरकाया और अपना हाथ उसकी चूत पे रख दिया ।
सारा की जान में जान आयी । अब जाके उसे थोड़ा चैन मिला ।
कबीर ने उसकी चूत को सहलाते हुए उसमें एक ऊँगली डाली तो सारा को थोड़ा दर्द हुआ । सुबह की चुदाई के बाद उसकी चूत में थोड़ी सूजन थी ।
कबीर ने अपनी ऊँगली निकाल ली और ऊपर से ही उसकी चूत मसलने लगा ।
थोड़ी देर में ही सारा की चूत ने अपना गरम पानी कबीर के हाथ पे छोड़ दिया और सारा को थोड़ी राहत हुई ।
कबीर ने सारा को वापस जाने का बोला और सारा ने जल्दी से अपनी सलवार बांधी और चली गयी ।
उसके कुछ देर बाद घंटी बज गयी और सारा अपना सामान लेके क्लास से चली गयी ।
कबीर भी क्लास से बाहर आया और उसने मेथी को फ़ोन लगाया ।
कबीर - कहाँ मर गया तू । आज स्कूल क्यों नही आया ।
मेथी - भैया... वो कल की धुलाई के बाद बहुत दर्द हो रहा है ।
कबीर - और कर पार्टी और फिर ऐसे ही अपने लौडे लगवाते रहना ।
मेथी - माफ़ कर दो भैया ।
कबीर - अच्छा सुन, कल तेरी दीदी का फ़ोन आया था । बोल रही थी घर आने को ।
मेथी - हाँ भैया । मैंने ही आपका नंबर दिया था । पापा आपसे मिलना चाहते हैं ।
कबीर - क्यों... अब क्या किया तूने ।
मेथी - नही भैया... आपने मुझे बचाया था इसलिए ।
कबीर - ठीक है मैं रात में aata हूँ । और सुन रात को तेरे घर पे ही रुकूंगा ।
मेथी - क्यों भैया ।
कबीर - साले रुकूंगा नही तो तेरी दीदी को पटाउंगा कैसे । और तू ही अपने पापा से बोलेगा मुझे रुकने के लिए । नही तो मैंने सच बोल दिया तो समझ लेना ।
मेथी - अरे... हो जायेगा भैया आप चिंता मत करो । मगर दीदी का क्या ।
कबीर - वो तू मुझपे छोड़ दे ।
मेथी - ठीक है भैया ।
कबीर - चल अभी रखता हूँ । रात को मिलता हूँ ।
कबीर ने अपना फ़ोन रखा और क्लास में चला गया ।
ऐसे ही पढ़ते पढ़ते लंच हो गया और कबीर ने कैंटीन में जाके खाना खाया ।
खाना खाके उसने सारा को मैसेज किया ।
कबीर - कहाँ है तू ।
सारा - स्टाफ रूम में मालिक ।
कबीर - मुझे मिलना है अभी ।
सारा - ऊपर वाले गर्ल्स टॉयलेट में आती हूँ मालिक ।
कबीर - जल्दी आ ।
सारा जल्दी से ऊपर वाले गर्ल्स टॉयलेट में पहुंची । इस टॉयलेट को कोई इस्तेमाल नही करता था क्योंकि ये दूसरे माले पर था और यहाँ कोई क्लास नही लगती थीं । दूसरा माला पूरा का पूरा खाली रहता था ।
कबीर जब ऊपर पहुंचा तो सारा पहले से ही उसका इंतेज़ार कर रही थी ।
कबीर ने सारा को देखा तो उसे छेड़ते हुए कहा -
कबीर - क्या बात है । मेरी ग़ुलाम की चूत में इतनी आग लगी है की वो सब कुछ छोड़ के चली आयी ।
सारा तो शर्म से मुँह नीचे करके मुस्कुराने लगी ।
सारा ने शर्माते हुए कहा - मालिक....
कबीर - वैसे एक बात तो है ।
सारा - क्या मालिक ।
कबीर - तेरा ये रूप सबसे ज़्यादा अच्छा है । अब मुझे जिसे मैडम कहके बुलाना चाहिए वो खुद मुझे मालिक बुलाती है । क्यों सही कहा ना मेरी लंड की प्यारी ग़ुलाम ।
सारा - जी मालिक ।
कबीर - अच्छा ये सब छोड़ । पहले ये बता की अभी लंच के बाद कौन कौन सी क्लास है ।
सारा - मालिक अगले दो पीरियड मेरे खाली हैं ।
कबीर - अरे वाह ये तो कमाल ही हो गया । वैसे भी तू क्लास लेती हुई अच्छी नही लगती । तू बस मेरे साथ क्लास लिया कर । गरमा गरम चुदाई की क्लास ।
सारा दुबारा शर्म से नीचे मुँह करके मुस्कुराने लगी ।
कबीर - चल अब शुरू करें ।
सारा - जी मालिक ।
और ये बोलते ही सारा ने अपने बदन पे पड़े उसके दो वस्त्र उसका सलवार कुर्ता निकाल फैका और नंगी हो गयी ।
कबीर उसे देखके बोला -
कबीर - हाय... ये तेरा क़ातिल बदन... उफ्फ्फ... बड़ा ही कड़क माल है तू सारू । काश की मैं तुझे हमेशा ऐसे नंगी रख पाता और सारी दुनियाँ को बताता की देखो दुनियाँ वालों, देखो भोसड़ीवालों कैसा नायब हीरा हाथ लगा है मेरे । सच कहता हूँ सारू तेरा इस नंगे बदन के सामने तो कोहिनूर की भी कोई औकात नही है ।
सारा - अपनी इस अजीब सी तारीफ से शर्मा भी रही थी और ख़ुशी से फूली भी नही समा रही थी ।
सारा जैसे ही कबीर के पास आयी तो कबीर बोला -
कबीर - ओह... पागल औरत क्या कर रही है ।
सारा - मालिक आप ही ने तो बोला ।
कबीर - अरे ओह होशियार पहले ये तो देख की कहाँ खड़ी है । मेरे इतने बुरे दिन नही आये की मैं तुझे टॉयलेट में चोदुँगा, हट... अपने पास इतना बड़ा स्कूल है और तुझे जगह मिली भी तो ये सड़ा हुआ टॉयलेट ।
भग यहाँ से...
सारा - तो आप ही बताओ ना मालिक आप मुझे कहाँ चोदना चाहते हो, वहीं चलते हैं ।
कबीर - देख इस दूसरे माले पे तो कोई आता नही है तो एक काम करते है यहीं किसी क्लास में चलते हैं, सब तो खाली पड़ी हैं, वहां जाके आराम से करेंगे ।
सारा - जी मालिक ।
और सारा टॉयलेट से बाहर जाने लगी तो कबीर बोला -
कबीर - अब तेरे इन कपड़ों को उठाने के लिए क्या मैं कोई नौकर रख लूं काम पे ।
सारा - रहने दो ना मालिक । यहाँ तो कोई वैसे भी नही आने वाला और आपको भी तो मैं नंगी पसंद हूँ ।
कबीर - बात तो तूने सही कही । इस तरह दिल लगाके मेहनत करती रह । बहुत जल्दी तू दुनियाँ की सबसे बड़ी और सबसे अच्छी ग़ुलाम बन जाएगी ।
सारा - थैंक यू मालिक । आगे से मैं और ज़्यादा मेहनत करुँगी आपको खुश रखने के लिए ।
कबीर - आज तो तूने दिल खुश कर दिया । आज तो मैं तेरी गांड मार के तेरा वो आख़री छेद भी खोलने वाला था पर जा आज तुझपे रहम किया ।
सारा - ओह मालिक... आप कितने अच्छे हो ।
कबीर - वो तो तुझे अभी थोड़ी देर मैं ही पता चल जाएगा ।
और ये बोलके कबीर ने सारा की एक चूची पकड़ ली और उसे चूची से खींचते हुए बाहर ले जाने लगा ।
कबीर सारा को चूँची से खींचता हुआ एक क्लास में ले गया और बोला -
कबीर - चल सारु अब दिखा तू कितनी अच्छी ग़ुलाम है । आज मैं कुछ नही करूँगा । सब कुछ तुझे की करना है । आज तेरी इस चुदाई के हुनर की परीक्षा है ।
सारा कबीर की बात सुनके मुस्कुराती हुई आयी और कबीर के कपड़े उतारने लगी । कबीर के सारे कपड़े उतारके उसने एक टेबल पर रखे और जाके कबीर को चूमने लगी ।
सारा ने कबीर के गालों को चूमना शुरू किया और दोनों गाल अच्छे से चूमे, उसके माथे को चूमा, उसकी आँखों को चूमा और अंत में अपने होंठ कबीर के होंठ पे रख दिए ।
सारा कबीर के होठों को खींच खींच के चूसती रही । दोनों होठों का रस निचोड़ने के बाद सारा ने अपनी जीभ उसके मुँह में डालने की कोशिश की जिसकी वजह से कबीर ने अपना मुँह खोला ।
सारा ने कबीर का मुँह खुलते ही उसकी जीभ को अपने होठों से पकड़ लिया और उसे चूसने लगी । इस जीभ चूसाई से कबीर के मुँह की लार सारा के मुँह में जा रही थी जिसे वो पी रही थी ।
कबीर तो बस आँखें बंद किये आराम से मज़े ले रहा था ।
सारा की जब सांस उखड़ने लगी तो उसने कबीर का मुँह छोड़ा और कबीर की गार्डन को चूमने लगी । उसने कबीर का गला, उसकी ठुड्डी, उसकी गार्डन उसके कंधे सब चूम चूम के लाल कर दिए और चाट चाट के गीले कर दिए ।
सब तरफ बस सारा के चूमने की आवाज़ें गूँज रही थीं । सारा चूमते हुए नीचे जाने लगी और कबीर की छाती को भी चूम चूम के और चाट चाट के पूरा गीला कर दिया ।
फिर सारा ने कबीर की छाती को चाटते हुए अपनी उँगलियों से उसकी चूची पे हमला किया और उन्हें कभी दबाती तो कभी सहलाती ।
कबीर तो अभी से ही सातवे आसमान मैं उड़ रहा था ।
सारा ने उसकी चूचीयां भी चूसी और उसके पूरे पेट को चूमते हुए उसकी नाभि में अपनी जीभ डालके उसे भी चाटने लगी ।
सारा की इस हरकत से कबीर का लंड जैसे फटने को हो गया मगर सारा बड़े आराम से अपना सब काम कर रही थी ।
फिर सारा नीचे बैठी और उसने कबीर के लंड को पकड़ के ऊपर उठाया और उसकी गोटियों को मुँह में भर लिया और धीरे धीरे उसके लंड को हिलाने लगी ।
कबीर की अब सिसकियाँ निकलने लगी थी । वो रह रह के आह... आह... कर रहा था ।
सारा ने कबीर के पूरे लंड पे अपनी जीभ घुमाई और उसे चाटने लगी । सारा कभी कबीर ले लंड को ऊपर से नीचे तक चाटती तो कभी उसके पूरे लंड को चूमने लगती ।
कबीर के लंड के एक एक हिस्से को अच्छे से चाटने और चूमने के बाद सारा ने अपनी जीभ से उसके टोपे को चाटा और कबीर की आवाज़ निकली -
कबीर - ओह्ह... सारू... आह्ह...
और इस आवाज़ के साथ कबीर के हाथ अपने आप नीचे चल पड़े और सारा का सर पकड़ के उसके मुँह में अपना लंड भरने लगे ।
सारा बड़ी तेज़ रफ़्तार से और झटकों के साथ कबीर का लंड चूस रही थी ।
पूरे कमरे में अब लंड चूसाई से गु... गु... गु... की आवाज़ें आ रही थीं ।
सारा कबीर के लंड को कुछ देर चूसती तो कुछ देर उसे बाहर निकाल के चाटती और फिर मुँह में ले लेती ।
कबीर अब झड़ने वाला था तो उसने सारा को रोका और उसे खड़ा किया ।
सारा जब खड़ी हुई तो उसकी आँखें हवस से भरी सुर्ख लाल हो रही थीं । और सारा जिस तरह चुप चाप खड़ी कबीर को देख रही थी उससे कबीर को पता नही क्यों सारा पे इतना प्यार आया की उसने तुरंत सारा के होंठ चूमने शुरू कर दिए ।
सारा तो पहले ही अपनी हवस की आग में जल रही थी अब वो भी खुलके कबीर का साथ दे रही थी । कबीर ने भी अपनी उस ग़ुलाम को सारे सुख दिए ।
कबीर ने सारा को सर से लेकर पैरों तक उसके बदन के एक एक इंच को बड़े प्यार से चूमा और चाटा ।
कबीर ने अपनी जीभ का कमाल दिखाते हुए सारा की ऐसी चूत चाटी की सारा कुछ ही मिनट में आह... उह... उम्म्म... ओह्ह्ह... उफ़... करती हुई झड़ गयी और कबीर उसकी चूत का सारा रस पी गया ।
अब कबीर और सारा दोनों हाफने लगे थे ।
कबीर ने सारा को किसी फूल सी बच्ची की तरह गोद में उठाया और उसे एक टेबल पे लिटा दिया और उसके पैर फैला के अपना लंड उसकी चूत पे रखा और उसे अंदर डालने लगा ।
सारा की सुबह की चुदाई की वजह से फूली हुई चूत में कबीर बड़े आराम से धीरे धीरे अपना लंड डाल रहा था ।
और थोड़ी ही देर में कबीर का पूरा लंड सारा की चूत में चला गया और कबीर ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किये ।
कुछ ही पलों में सारा मस्ती के एक अनोखे समुन्दर में गोते लगा रही थी और उम्म... उम्म्म... की मादक सिसकियों के साथ खुद भी कबीर के साथ कदम ताल करती हुई धक्के लगा रही थी ।
कबीर ने धक्के लगाते हुए सारा की चूची चूसनी शुरू की और सारा तेज़ तेज़ सिसकियों के साथ चिल्लाने लगी ।
सारा - आह... मेरे मालिक... बहुत मज़ा आ रहा है... ओह्ह्ह... आह... मुझे हमेशा चोदना... मुझे रोज़ चोदना... आह... उम्म्म... मुझे हर पल चोदना... मुझे बस चोदते रहना...
सारा अब झड़ने के नज़दीक थी उसने कबीर की कमर को पकड़ के अपने ऊपर दबाव बनाना शुरू किया जैसे चाहती हो की कबीर का लंड और अंदर तक जाए, उसके गले तक चला जाए ।
सारा अब चिल्लाते हुए झड़ने लगी ।
सारा - ओह्ह्ह... मेरे मौला... ये कैसा नशा है जो बढ़ता ही जाता है... उफ्फ्फ... मुझे चोदो... मुझे रात दिन चोदो... आहहह... मुझे अब बस आपसे चुदते ही रहना है मेरे मालिक... ओह्ह्ह... अपना लंड मेरी चूत से कभी ना निकालना... उम्म्म.... मैं गयी... मेरा निकल रहा है... अल्लाह... बचाओ... मुझे कुछ हो रहा है... आअह्ह्ह....
सारा झड़ने के बाद वैसे ही थकी हुई निढाल पड़ी रही और कबीर उसे चोदता रहा ।
थोड़ी ही देर में कबीर भी झड़ने वाला था तो उसने अपना लंड सारा की चूत से बाहर निकला और सारा के मुँह के सामने कर दिया ।
सारा ने तुरंत अपना मुँह खोला और कबीर के लंड को चूसने लगी ।
कबीर के लंड से वीर्य की जितनी भी धार निकली, सारा वो सब पी गयी और कबीर के वीर्य की एक एक बूँद चाट लेने के बाद उसने कबीर के लंड को चूस के अच्छे से साफ किया और दोनों वहीं लेट गए और हाँफ्ते रहे ।
जब दोनों की साँसे दुरुस्त हुई तो सारा ने कबीर को पागलों की तरह चूमते हुए कहा -
सारा - आई लव यू मालिक । आज से आप सच मैं मेरे इस शरीर के, मेरी इस रूह के, मेरे वजूद के मालिक हो । मैं खुद अपनी अंतरात्मा से अपना सब कुछ आपको सौंपती हूँ । आपको मुझे जैसे रखना है रखो, मेरे साथ जो करना है करो, मुझसे जहाँ भी जो मन हो वो करो और करवाओ । आज के बाद मुझे बस आपके हुक्म का ही इंतेज़ार रहेगा । और आज के बाद मुझे आप से दिन भर चुदवाना है । आई लव यू मेरे मालिक ।
सारा को एकदम से इस तरह का बर्ताव करते देख एक पल के लिए कबीर को भी झटका लगा और उसने मुस्कुराते हुए बस एक ही शब्द बोला -
कबीर - हम्म...
कबीर ने अपने कपड़े पहने और सारा को अपनी बाहों मैं भरके बाहर ले गया और टॉयलेट मे ले जाके खुद अपने हाथों से सारा को कपड़े पहनाये ।
सारा - क्या हुआ मालिक । आप मुझे कपड़े क्यों पहना रहे हो । क्या आपका मुझसे इतनी जल्दी मन भर गया ।
कबीर ने सारा के माथे को प्यार से चूमा और उसे अपने गले से लगाया और उसके सर पे हाथ फेरते हुए बोला -
कबीर - नही... ऐसी कोई बात नही है सारु ।
सारा को ये सुनके राहत भी हुई और ख़ुशी भी ।
फिर कबीर ने सारा को कैंटीन मैं ले जाके चाय पिलाई और खुद भी पी और सारा से बोला -
कबीर - सारू... आज छुट्टी के बाद यहाँ नही रुकेंगे । कहीं घूमने चलेंगे ।
कबीर की बात सुनके सारा का रोम रोम ख़ुशी से झूम उठा और कबीर चाय पीके कैंटीन से निकल गया ।
 

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कबीर ने जाके अपनी बची हुई क्लास पूरी की और सारा ने भी अपना काम ख़त्म किया ।
आख़री पीरियड में भी कुछ ख़ास नही हुआ ।
सारा का मन तो था की कबीर उसे कुछ बोले उसके साथ कुछ करे मगर पहली बार में ही सुबह से हो चुकी दो बार की चुदाई के बाद कबीर ने उसे अभी और परेशान करना ठीक नही समझा ।
वैसे भी तो सारा कहाँ भागी जा रही थी ये सोचके उसने सारा को थोड़ा आराम दे दिया ।
छुट्टी के बाद जब सब बच्चे चले गए तो सारा कबीर के पास आयी और बोली -
सारा - मालिक अब मेरे लिए क्या आदेश है ।
कबीर - चल कहीं घूमने चलें ।
सारा - जी मालिक ।
जब वो दोनों निकलने लगे तो सारा के कबीर का हाथ पकड़ा और अपनी गांड पे रखके चलने लगी ।
कबीर ने अपना हाथ वहां से हटा लिया क्योंकि सारा से अभी ठीक से चला भी नही जा रहा था ।
खैर ना सारा ने कुछ बोला और ना कबीर ने । दोनों चुप चाप जाके गाड़ी में बैठ गए और स्कूल से निकल गए ।
कबीर सारा को लेके एक मॉल में गया और उसे खूब सारी ख़रीदारी कराई । जूते, सैंडल से लेके सभी तरह के कपड़े दिलाये । उसे मेकअप से लेके रोज़मर्रा की सभी ज़रूरी चीज़ें और ज्वेलरी भी दिलायी ।
सारा तो बस चुप चाप चलती और हैरानी से कबीर को पैसा लुटाते देखती रही ।
कबीर ने इतना सामान खरीदा की उसे उठाना दो लोगों के बस की बात नही थी । उसने वहां के मैनेजर से बोल के सब सामान अपनी गाड़ी में रखवा दिया और सारा से बोला -
कबीर - भूख लगी है क्या ।
सारा - जी मालिक ।
कबीर - चल फिर कुछ खाते हैं चलके ।
कबीर सारा को इस बार एक बड़े ही आलिशान रेस्टोरेंट में ले गया और खाना भी सारा की पसंद से मंगवाया ।
सारा कबीर के इस बर्ताव से उसे अपना इतना ध्यान रखते देख के बड़ी खुश थी । सारा कबीर से चिपक के बैठी थी और फिर भी कबीर उसे बिलकुल नही छेड़ रहा था ।
कबीर ने बड़े प्यार से सारा के सर पे हाथ फैरते हुए उसके सर को अपने कंधे पर रख दिया और उसे सहलाता रहा ।
थोड़ी ही देर में खाना आया तो कबीर ने सारा को अपने हाथों से खाना खिलाया ।
सारा इतनी खुश थी की कहीं ना कहीं वो अंदर से बहुत ज़्यादा जज़्बाती हो रही थी ।
खाने के बाद कबीर सारा के लिए आइस क्रीम लाया और सारा उसे खाते हुए कबीर के साथ गाड़ी की तरफ चल दी ।
कबीर ने सारा को गाड़ी में बिठाया और उसे घर छोड़ा ।
कबीर ने सब सामान अंदर रखा और सारा से कहा -
पहले जाके गरम पानी से नहा ले, उससे तेरी थोड़ी सिकाई भी हो जाएगी तो सूजन थोड़ी कम हो जाएगी । और हाँ... नहाने के बाद दर्द की गोली भी खा लेना ।
मैं अब चलता हूँ । अगर शाम को समय मिला तो आऊंगा नही तो फिर सुबह मिलेंगे । और अगर कोई बात हो फ़ोन कर लेना ।
सारा - मालिक... वो...
कबीर - यही पूछना है ना की इतनी सारी ख़रीदारी और कपड़े...
सारा - जी मालिक ।
कबीर - तू अब मेरी है सारू तो तेरी कोई भी चीज़ सस्ती नही होनी चाहिए, समझी ।
सारा - जी मालिक ।
कबीर - मालिक की बच्ची, चल अब आके दरवाज़ा बंद कर । मैं चलता हूँ ।
कबीर के जाने के बाद सारा काफी देर तक कबीर के बदले हुए मिजाज़ के बारे में सोचती रही । वो कबीर के इस प्यार से उसकी हर चीज़ का ध्यान रखने से खुश भी थी और भावुक भी ।
वहीं कबीर के मन में कई सारे विचार उमड़ रहे थे । वो खुद नही समझ पा रहा था की आखिर वो चाहता क्या था । क्या उसका सारा को प्यार करना, या उसकी चिंता करना और ध्यान रखना सिर्फ एक मालिक और ग़ुलाम के रिश्ते की वजह से या कहें उनके उस अनुबंध की वजह से था या सच में अब वो सारा को धीरे धीरे चाहने लगा था । उसके मन में बड़ी उथल पुथल मची हुई थी ।
कबीर अपने मन के विचारों को उसकी अंतरात्मा की आवाज़ को टटोलते हुए घर पहुंचा ।
कबीर को देख कामीनी खुश हो गयी और कबीर के गले लग के बोली -
कामीनी - आ गए आप । चलिए आप फ्रेश हो जाओ मैं खाना लगाती हूँ ।
कबीर - नही भूख नही है । तू कमरे में चल मैं अभी आता हूँ ।
कामीनी अपने कमरे में चली गयी और कबीर स्वीटू के पास गया ।
स्वीटू लेटी हुई थी और कबीर ने जाके उसके माथे को चूमा और वो उठ बैठी ।
कबीर - सारा दिन बस आराम ही करती रहना ।
स्वीटू - अभी तो लेटी थी ।
कबीर - कुछ पढ़ भी लिया कर वरना फ़ैल हो जाएगी ।
स्वीटू - हाँ ना... बस थोड़ी देर में पढ़ती हूँ ।
कबीर - चल नीचे आजा अपनी किताबें लेके ।
काबिर नीचे चला गया और कामीनी को उसने अपनी गोद में लिटा लिया और वहीं वो स्वीटू को पढ़ा भी रहा था ।
तीनों ही खुश थे । स्वीटू कबीर से पढ़ते हुए, कामीनी कबीर की गोद में प्यार से लेटे हुए और कबीर अपने छोटे से परिवार को खुश देखके बड़ा खुश था ।
कामीनी तो कबीर की गोद में लेटे लेटे सो गयी और कबीर स्वीटू को शाम तक पढ़ाता रहा ।
शाम को कामीनी उठी और कबीर ने भी स्वीटू को छुट्टी दे दी ।
कबीर स्वीटू से बोला -
कबीर - रक्षाबंधन आ रहा है स्वीटू । बता तुझे क्या चाहिए ।
स्वीटू - कुछ भी नही ।
कामीनी - अरे मांग ले पगली । ऐसा भाई तुझे कहीं नही मिलेगा ।
स्वीटू - भाई...
कामीनी - तो और क्या... वो तेरा भाई तो हमेशा ही रहेगा ना ।
स्वीटू - सोच के बताउंगी भाई ।
कबीर - चल ठीक है, बता देना जो भी चाहिए हो ।
स्वीटू - ओके...
चलो अब कोई मुझे चाय तो पिला दो ।
कामीनी चाय बनाने चली गयी और कबीर छत पे आ गया ।
थोड़ी देर में स्वीटू भी छत पे चाय ले आयी ।
स्वीटू कबीर को चाय देते हुए बोली -
स्वीटू - हो कहाँ आज कल । कभी दिन भर गायब रहते हो तो कभी रात भर ।
कबीर - हाँ कुछ अधूरे काम पूरे कर रहा हूँ ।
स्वीटू - अच्छा वो वाले ।
कबीर - हम्म...
स्वीटू - तो कुछ बात बनी क्या ।
कबीर - हम्म... बन जाएगी ।
स्वीटू - एक बात पूछूँ ।
कबीर - पूछ
स्वीटू - क्या सच मैं पापा के साथ...
कबीर - तूने पढ़ा है ना...
स्वीटू - हम्म...
कबीर - तू इन सब के बारे में मत सोच... मैं देख लूंगा ।
स्वीटू - ठीक है भाई ।
कबीर - चल अब चाय पी । ठंडी हो रही है ।
दोनों ने चाय ख़त्म की और कबीर बोला -
कबीर - अब तू जा । मुझे कुछ देर अकेला छोड़ दे फिर मुझे रात में प्रताप नारायण के घर भी जाना है ।
स्वीटू - भैया... लेकिन वो तो...
कबीर - कोई लेकिन वेकीन नही...
स्वीटू - ओके भाई... मगर अपना ध्यान रखना ।
कबीर - तू चिंता मत कर । चल अब जा और मुझे कुछ सोचने दे ।
स्वीटू के जाने के बाद कबीर थोड़ी देर तक छत पर तहलता रहा फिर नीचे आ गया ।
कबीर अपने बिस्तर पर आके बैठा ही था की तमन्ना का मैसेज आ गया ।
तमन्ना - भाई...
कबीर - हाँ बोलो...
तमन्ना - नाराज़ हो क्या ।
कबीर - नही तो ।
तमन्ना - आप बात क्यों नही करते ।
कबीर - कुछ काम में उलझा हुआ हूँ ।
तमन्ना - भाई एक बात पूछूँ ।
कबीर - हाँ पूछो...
तमन्ना - आप स्वीटी से प्यार करते हो ना ।
कबीर - ये कैसा सवाल है । दुनियाँ में कौन भाई अपनी बहन से प्यार नही करता ।
तमन्ना - मेरा मतलब भाई बहन वाला नही गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड वाला ।
कबीर - क्या बकवास कर रही है । तेरा दिमाग तो ठीक है ।
तमन्ना - क्यों भाई... क्या मुझे पता नही है ।
कबीर - क्या पता है ।
तमन्ना - जो आप दोनों के बीच में चल रहा है ।
तमन्ना की बात से कबीर का हलक सूख गया और उसे डर लगने लगा । मगर फिर भी उसने डरते हुए मैसेज किया ।
कबीर - क्या पता है तुझे ।
तमन्ना - यही की जिस तरह से आप दोनों एक दूसरे को देखते हो । आप दोनों की आँखों में साफ झलकता है और स्वीटू जिस तरह से आपसे बात कर रही थी कल रात में, उससे तो कोई भी समझ जायेगा ।
कबीर - तू होश में तो है । तुझे पता है तू क्या बोल रही है ।
तमन्ना - क्यों भाई सच नही है क्या ।
कबीर - मुझे नही पता था तमन्ना तू ऐसा सोच सकती है । बेहतर होगा तू आज के बाद मुझसे बात मत करना ।
कबीर फ़ोन रख देता है । उसका गुस्सा चरम पे था मगर उसकी गांड भी फटी पड़ी थी । उसने मन में सोचा - साला ये तमन्ना को कैसे... और ये स्वीटू भी मरवा देगी किसी दिन । भेनचोद क्या नयी मुसीबत है । अब इस तमन्ना की बच्ची का क्या करूँ ।
उधर तमन्ना लगातार मैसेज कर रही थी मगर कबीर कोई जवाब नही दे रहा था । जवाब देने के लिए उसके पास वैसे भी कोई जवाब नही था ।
अभी कबीर अपनी इस नयी परेशानी में उलझा था की उसका फ़ोन बजा ।
कबीर ने झट से फ़ोन उठाया और चिल्लाया -
कबीर - तेरी एक बार में बात समझ नही आती क्या । बोला ना नही बात करनी । फ़ोन रख ।
जैसे ही कबीर चिल्लाया तो दूसरी तरफ से डरती हुई आवाज़ आयी - क्या हुआ भैया... मुझसे कोई गलती हो गयी क्या ।
कबीर ने अपना फ़ोन देखा तो मेथी का कॉल था ।
अब कबीर के बचे कुचे तोते भी उड़ गए मगर गुस्सा और बढ़ गया और वो फिर चिल्लाया -
कबीर - क्या है बे... तेरी गांड में बड़ी आग लगी हुई है ना... रुक आज तेरी गांड ही मार देता हूँ...
कबीर की बात सुनके मेथी ने सॉरी की झड़ी लगा दी ।
कबीर - सॉरी सॉरी क्या करता है । तू रुक जा बड़े नशे करने का शौक है ना तुझे । आने दे मुझे बताता हूँ तेरे बाप को ।
मेथी - भैया गलती हो गयी... सॉरी भैया... माफ़ कर दो ।
कबीर - आंड मत खा... चल फ़ोन रख । आता हूँ थोड़ी देर में ।
इधर कबीर अपनी परेशानी में हैरान परेशान हुआ जा रहा था तो उधर मेथी के हवा निकल गयी थी । वो सोचता रहा की आज तो उसका क्रिया करम होने वाला है । अगर भैया ने मुँह खोल दिया तो मैं कहीं का नही बचूंगा । क्या करूँ... है भगवान बचा ले मुझे...
कबीर ने फ़ोन रखा और घड़ी देखी तो 7 बज रहे थे ।
उसने अपने जाने की तैयारी शुरू की और अपनी दाढ़ी बनाके, नहा धोके तैयार होने लगा ।
कबीर तैयार होके आया तो स्वीटू को बोला -
कबीर - स्वीटू... मैं जा रहा हूँ... तू कामीनी को संभाल लेना ।
स्वीटू - ठीक है भाई... मगर अपना ध्यान रखना ।
कबीर - अरे मुझे कुछ नही होगा पगली । चल मैं चलता हूँ वरना देर हो जाएगी ।
स्वीटू - ठीक है...
कबीर ने अपनी गाड़ी निकाली और मेथी को फ़ोन करके बोला की वो 8 बजे तक आ रहा है ।
उधर मेथी ने कोई जवाब नही दिया और डर के मारे उसकी हालत और ज़्यादा खराब हो गयी ।
कबीर ने रास्ते से एक बढ़िया सी विदेशी स्कॉच की बोतल ली और फिर एक सुन्दर सा गुलदस्ता लिया ।
उसके बाद कबीर ने मेडिकल से जाके कुछ दवाई ली और मेथी के घर पहुंचा ।
कबीर मेथी के घर पहुंचा तो एक औरत ने आके दरवाज़ा खोला । कबीर को समझते देर ना लगी की ये मेथी की माँ सुलोचना है ।
कबीर को देखके सुलोचना बोली -
सुलोचना - तुम कबीर हो ना ।
कबीर - जी आंटी ।
कबीर ने सुलोचना के पैर छुए और सुलोचना ने भी प्यार से आर्शीवाद देते हुए उसे अंदर बुलाया ।
कबीर ने सुलोचना को गुलदस्ता दिया जिससे सुलोचना काफी खुश हुई ।
और अंदर आकर कबीर ने मेथी के पापा प्रताप को नमस्ते किया और उन्हें स्कॉच की बोतल दी ।
प्रताप कबीर से बोला -
प्रताप - अरे बेटा... इन सब की क्या ज़रूरत थी ।
कबीर - अंकल पहली बार किसी के घर खाली हाथ नही जाते इसलिए ले आया ।
प्रताप - चलो कोई बात नही... आओ आओ बैठो ।
सुलोचना को कबीर का व्यवहार पसंद आया और वो बोली -
सुलोचना - बेटा तुम बातें करो, मैं चाय नाश्ता लगवती हूँ ।
कबीर - आंटी मगर इस समय... थोड़ी ही देर में तो खाने का समय हो जायेगा । आप बस पानी पिलवा दीजिये ।
सुलोचना - अभी लायी...
प्रताप ने कबीर से बातें शुरू की और सारी पूछ परख की ।
प्रताप पूछता गया और कबीर बताता गया । मगर जैसे ही प्रताप को पता चला की वो महेंद्र का भांजा है तो वो बोला -
प्रताप - अरे तुम महेंद्र के भांजे हो ।
कबीर - जी
प्रताप - महेंद्र से तो मेरे बड़े गहरे सम्बन्ध है । तब तो बेटा तुम इसे भी अपना ही घर समझो ।
कबीर - जी शुक्रिया अंकल ।
ऐसे ही काफी देर तक प्रताप की कबीर से बातें होती रही और फिर कबीर बोला -
कबीर - अंकल मेथी कहाँ है ।
प्रताप - बेटा वो तो अपने कमरे मैं होगा । उससे तो बिस्तर से उठा भी नही जा रहा है ।
कबीर - आप कहें तो मैं उसे मिल लूं जाके ।
प्रताप - कैसी बात कर दी बेटा अब तो ये तुम्हारा अपना ही घर है, जाओ जाओ मिल लो उससे ।
कबीर - जी अंकल ।
कबीर प्रताप से विदा लेकर ऊपर आया और मेथी के पास गया मगर मेथी तो सो रहा था ।
कबीर ने सोचा की दवाओं की वजह से नींद आ गयी होगी शायद ।
वो वापस नीचे जाने लगा तो उसे अनंगवती का ख्याल आया और वो कमरे को ढूंढ़ता हुआ उसके पास पहुंचा ।
आंगवती तो अपने मोबाइल में घुसी हुई थी ।
कबीर ने उसे देखा और बोला -
कबीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ ।
अनंगवती चौकते हुए - तुम... तुम यहाँ कैसे...
कबीर - देखने आया था की जिस कमरे में मुझे रात गुज़ारनी है वो है कैसा ।
अनंगवती - इतना ज़्यादा हवा में मत उड़ो समझें... और देख लिया ना अब जाओ यहाँ से...
कबीर - ओके...
कबीर वहां से जाने लगा तब तक मेथी उसे लंगड़ाता हुआ आते हुए दिखाई दिया ।
मेथी - अरे भैया आप...
कबीर उसे गुस्सा दिखाते हुए बोला -
कबीर - जा रहा हूँ मैं...
मेथी - लेकिन क्यों...
कबीर - पूछ तेरी बहन से... और अब अपने बाप को भी बताना की तू क्या क्या करता है...
मेथी तो सीधे कबीर के पैरों में गिर गया ।
उधर आंगवती को इनकी बातें सुनाई नही दे रही थीं मगर उसे दिख सब रहा था ।
मेथी कबीर के पैर पकड़ के - प्लीज भैया... ऐसा ना करो... मैं कुछ करता हूँ... मुझे टाइम तो दो...
कबीर - ठीक है... जो करना है जल्दी कर तब तक मैं नीचे जाके बैठता हूँ ।
मेथी - जी भैया ।
और कबीर नीचे चला गया ।
 

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कबीर के जाते ही मेथी अनंगवती के पास पहुंचा ।
अनंगवती मेथी से बोली -
अनंगवती - ये क्या चल रहा था तेरे और कबीर के बीच ।
मेथी - कुछ भी तो नही ।
अनंगवती - तो तू उसके पैर क्यों पड़ रहा था ।
मेथी - दीदी... वो... वो...
अनंगवती - ठीक से नही बोल सकता क्या ।
मेथी - मुझे बचा लो दीदी... कबीर ने अगर पापा को बता दिया तो मैं कहीं का नही बचूंगा ।
अनंगवती - तो मैं क्या करूँ... तेरे लफड़े में मैं नही पडूंगी ।
मेथी अनंगवती के पैर पकड़ लेता है लेकिन वो नही मानती ।
उधर कबीर नीचे बैठके प्रताप से बातें कर रहा था ।
कबीर ने प्रताप को मेथी के बारे में कुछ कुछ बताया ।
कबीर की बात सुनके प्रताप गुस्से में चिल्लाया -
प्रताप - मेथी... मेथी...
मेथी - आया पापा ।
मेथी तुरंत नीचे पहुंचा और बोला -
मेथी - जी पापा ।
प्रताप - ये कबीर क्या बोल रहा है ।
मेथी की फटने लगी थी । उसने चुपके से हाथ जोड़के कबीर को मानाने की कोशिश की ।
उधर प्रताप चिल्लाया -
प्रताप - तुझे मैंने बोला था सुधार जा लेकिन तुझे समझ नही आता । तू ऐसे नही सुधरेगा ।
प्रताप ने मेथी को मारना शुरू किया । मेथी दर्द से चिल्ला रहा था -
मेथी - नही पापा... मत मारो... पापा दर्द हो रहा है... इस बार माफ कर दो पापा...
लेकिन प्रताप बहुत ज़्यादा गुस्से में था । उसने मेथी का हाथ पकड़ा और उसे खींच के बाहर ले गया और बोला -
प्रताप - निकल जा साले में घर से । और दुबारा यहाँ आस पास भी नज़र आया तो गोली मार दूंगा ।
ऊपर से अनंगवती सब कुछ देख रही थी मगर प्रताप के गुस्से से डर के वो भी चुप थी ।
प्रताप और मेथी की आवाज़ सुनके सुलोचना भाग के आयी और उसने प्रताप को रोकने और समझाने की कोशिश की मगर प्रताप कुछ सुनने के मूड में नही था । उसने सुलोचना को धक्का दिया और जाके अपनी स्कॉच पीने लगा ।
उधर मेथी घर के बाहर जाके एक कोने में बैठके रोने लगा और इधर सुलोचना भी रो रही थी ।
प्रताप सुलोचना पे चिल्लाया -
प्रताप - बंद कर ये रोना धोना । तेरे ही लाड प्यार ने उसे इतना बिगाड़ दिया की वो सर पे चढ़ गया था । तुझे इतना ही दुख हो रहा है तो तू भी जा सकती है ।
सुलोचना के लिए प्रताप का इस तरह गुस्सा करना कोई नयी बात नही थी इसलिए वो अंदर चली गयी ।
कबीर मौका देखके अनंगवती के पास पहुंचा ।
कबीर को देखके अनंगवती बोली -
अनंगवती - क्यों आये हो अब मेरे पास ।
कबीर - तुझे बताने आया हूँ की ये तो अभी शुरुआत है । अगर तूने मेरी किसी भी बात से इंकार किया तो मेथी अभी सिर्फ घर से गया है, उसे दुनियाँ से जाते देर नही लगेगी ।
अनंगवती - भगवान के लिए हमें छोड़ दो । हमने ऐसा क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ।
कबीर - हाहाहा... अगर तुझे भी भगवान के लिए छोड़ दिया तो मुझे क्या मिलेगा ।
अनंगवती - तुम क्या चाहते हो मुझसे ।
कबीर - मैं तो तुझे चाहता हूँ और तुझे पाना चाहता हूँ । अगर तू चुप चाप और ख़ुशी ख़ुशी मेरा साथ दे तो मैं मेथी को वापस बुला सकता हूँ ।
आंगवती - और अगर मैंने मना किया तो ।
कबीर - तो पहले मेथी फिर सुलोचना... तू सोच ले क्या करना है ।
अनंगवती - नही कबीर मैं हाथ जोड़ती हूँ... माँ को कुछ मत करना । तुम जैसा बोलोगे मैं वैसा करुँगी ।
कबीर - ये की तूने समझदारी वाली बात । तो मैं बुलाता हूँ मेथी को मगर याद रख अगर बाद में तू अपनी बात से पलटी तो....
अनंगवती - नही... नही... मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ ।
कबीर - ठीक है फिर देख मैं कैसे मेथी को लाता हूँ और याद रखना मैं खाना खाके तेरे ही कमरे में आऊंगा ।
अनंगवती - ठीक है ।
कबीर फटाफट नीचे गया और प्रताप से काफी देर तक बात की और उसे बहुत कुछ समझाया ।
उधर सुलोचना भी रोते रोते किचन से कबीर और प्रताप को बातें करते देख रही थी ।
काफी देर की मेहनत के बाद प्रताप का गुस्सा कुछ कम हुआ तो कबीर मेथी को लेके आया ।
प्रताप ने मेथी को थोड़ी बहुत फटकार लगायी और मेथी ने माफ़ी मांगी ।
उधर अनंगवती ऊपर खड़ी खड़ी हैरानी से सब कुछ होते हुए देख रही थी तो सुलोचना का भी अब रोना बंद हो गया था ।
प्रताप ने सुलोचना को बुलाया और उसे कबीर को उसके पैसे वापस करने को बोला ।
कबीर ने तुरंत सुलोचना को रोका और प्रताप से कहा -
कबीर - जाने दीजिये अंकल... मेथी मेरा छोटा भाई है । और मैंने उसकी जान बचायी है, मैं पैसे तो नही लूंगा । मैं तो बस उसका भला चाहता हूँ, बस मुझे मेथी से वादा चाहिए की आज के बाद वो दुबारा कभी ऐसा नही करेगा । और मेरी बात मानेगा ।
कबीर की बात सुनके मेथी ने कबीर के पैर पकड़ लिए और बोला -
मेथी - मुझसे गलती हो गयी भैया, मुझे माफ़ कर दो । अब से आप जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूँगा ।
मेथी की बात सुनके कबीर ने एक बार ऊपर खड़ी अनंगवती को देखा और मेथी को उसके कमरे में भेज दिया ।
मेथी के जाते ही सुलोचना ने कबीर को गले लगा लिया और रोते हुए अपना प्यार बरसाने लगी ।
कबीर ने सुलोचना के आंसू पोछे और कहा -
कबीर - आंटी अब तो सब ठीक है तो अब खाना भी खिला दो, बहुत भूख लगी है ।
सुलोचना मुस्कुराती हुई किचन में चली गयी खाना बनाने और कबीर वहीं बैठके अपने मोबाइल में लग गया ।
थोड़ी देर में कबीर भी किचन में चला गया और सुलोचना से बात करने लगा ।
कबीर - आंटी इतने बड़े घर में आप बस तीन ही लोग रहते हो क्या ।
सुलोचना - अरे नही बेटा, तीन नही चार । मेथी की बहन भी तो है । अरे हाँ मैंने तो तुमको उससे मिलवाया ही नही । रुको मैं बुलाती हूँ उसे ।
सुलोचना ने आंगवती को आवाज़ दी और वो नीचे आयी ।
सुलोचना ने दोनों का परिचय करवाया और कबीर ने नमस्ते किया तो आंगवती ने भी नमस्ते किया ।
फिर ऐसे ही इधर उधर की बातें करते हुए रात का खाना बना और सब खाना खाने बैठे ।
खाना खाते खाते मेथी ने कबीर को आज रात रुकने को बोला तो सुलोचना ने तुरंत ही कह दिया ।
सुलोचना - हाँ बेटा... अगर तुम्हे बुरा ना लगे तो आज रात यहीं रुक जाओ मेथी के पास ।
कबीर - जी आंटी आप जैसा कहें ।
खाना खाते खाते काफी रात हो गयी थी तो सब लोग अपने अपने कमरे में जाने लगे और मेथी कबीर को ऊपर ले आया ।
कबीर पहले छत पे गया और वो छत पे टहलता रहा ।
वो सबके सो जाने का इंतेज़ार कर रहा था ।
उसने मेथी को फ़ोन करके बोला की जब सब सो जाएं तो मुझे बुला लेना और अनंगवती को भी फ़ोन कर दिया की मैं आने वाला हूँ तो सो मत जाना ।
थोड़ी देर में मेथी ने कबीर को नीचे बुलाया ।
कबीर नीचे आया और मेथी को लेके अनंगवती के कमरे में गया ।
अनंगवती बिस्तर पर ही बैठी थी । जैसे ही दोनों कमरे में आये वो बस चुप चाप देखती रही ।
कबीर ने मेथी से बोला -
कबीर - चल अब दरवाज़ा बंद कर ।
मेथी दरवाज़ा बंद करके आया तो कबीर बोला -
कबीर - मेथी जा अपनी दीदी के कपड़े उतार ।
कबीर की बात सुनके दोनों डर गए । अनंगवती की हवा निकल गयी और मेथी रोते हुए बोला -
मेथी - भैया प्लीज ऐसा मत करो... वो मेरी दीदी है...
प्लीज भैया ।
कबीर - लगता है तू घर में वापस आके खुश नही है...
मेथी - प्लीज भैया... आपके हाथ जोड़ता हूँ... आप कुछ भी करा लो... मगर ये मत कराओ...
कबीर - देख तुझे 1 मिनट का समय देता हूँ... जल्दी कर... वरना...
मेथी रोते रोते अनंगवती के पास गया और उसके कपड़े उतारने शुरू किये ।
अनंगवती ने अपनी आखें बंद कर ली और वो भी रोने लगी ।
मेथी अनंगवती के कपड़े उतारता जा रहा था और कबीर अपने मोबाइल में सब रिकॉर्ड कर रहा था ।
जब मेथी ने अनंगवती का टॉप और जीन्स उतार दी तो कबीर बोला -
कबीर - अनंगवती आँखें खोल अपनी और दोनों एक दूसरे की आँखों में देखो । मेथी अपनी दीदी की आँखों में देखते हुए उसकी ब्रा पैंटी उतार ।
मेथी - प्लीज भैया छोड़ दो ।
कबीर - हाँ चोद दूंगा... तू पहले अपनी दीदी को नंगा तो कर । चल शुरू हो जा ।
मेथी ने अनंगवती की ब्रा पैंटी भी उतार दी और पूरा नंगा कर दिया ।
कबीर मेथी से बोला -
कबीर - शाबाश मेरे शेर... ज़िन्दगी में पहली बार तूने कोई अच्छा काम किया है और इसका तुझे इनाम भी मिलेगा । जा तुझे मैंने तेरी दीदी की ब्रा पैंटी इनाम में दी । अब उठा और दफ़ा हो जा यहाँ से ।
मेथी फटाफट अनंगवती की ब्रा पैंटी लेके भाग गया ।
मेथी के जाते ही कबीर अनंगवती के पास गया और उसे बाहों में भरके उसे चूमने लगा ।
अनंगवती अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करती रही और अपना मुँह इधर उधर घुमाती रही ।
कबीर ने उसके सर को कस के पकड़ा और उसके होठों पे अपने होंठ रख दिए ।
कबीर बिना रुके उसके होठों को चूसता रहा जिससे अनंगवती की सांस रुकने लगी और वो छटपटाते हुए अपने हाथ पटकने लगी ।
कबीर ने उसके होठों को छोड़ा और ज़ोर से उसकी चूची खींचते हुए बोला -
कबीर - आजा मेरी रानी... मेरे कपड़े उतार और मेरा लंड चूस ।
अनंगवती ने अपने काँपते हुए हाथों से कबीर के कपड़े उतारे और उसे नंगा कर दिया ।
कबीर के नंगे होते ही अनंगवती की नज़र उसके लंड पे गयी और वो कबीर के विशालकाय लौडे को देख के घबरा गयी ।
कबीर ने अनंगवती की स्तन पे एक चाटा मारा और बोला -
कबीर - इतना समय नही है... जल्दी चूसना शुरू कर ।
कबीर के मारने से अनंगवती की आह... निकल गयी और वो अपने लाल हो चुके स्तन को मलते हुए धीरे से आगे आयी और कबीर का लंड पकड़ लिया ।
अनंगवती के हाथ में लंड जाते ही कबीर मस्ती में झूम उठा ।
कबीर - आह... क्या नरम हाथ है तेरे... हाथ लगते ही मज़ा आ गया ।
अनंगवती ने धीरे धीरे उसके लंड को चूमना शुरू किया । उसे बड़ा ही अजीब लग रहा था मगर जैसे ही उसने कबीर के लंड के टोपे को चूमा कबीर ने उसका सर पकड़ के ज़ोरदार धक्का मारा और अपना लंड उसके मुँह में भर दिया ।
अनंगवती की आँखों से आंसू निकल आये और उसे दर्द भी होने लगा ।
कबीर ने कुछ देर उसके सर को पकड़ के धक्के लगाए और फिर छोड़ दिया ।
इतनी देर में अनंगवती को भी आदात सी होने लगी थी और वो अब खुद ही बड़े आराम से कबीर का लंड चूस रही थी ।
कबीर भी मस्ती में मस्त होते हुए बड़बड़ाने लगा -
कबीर - तुझसे पहले भी कितनो ने मेरा लंड चूसा पर तुझमें कुछ अलग ही बात है । एक अलग ही कशिश है तेरी इस चूसाई में । वाह...
अनंगवती भी अब सुर... सुर... करके लंड चूस रही थी और कबीर झड़ने के करीब था तो कबीर बोला -
कबीर - मैं झड़ने वाला हूँ... मेरा निकलने वाला है... एक अच्छी बच्ची की तरह सारा पी जाना... एक बूँद भी ज़ाया नही करना ।
कबीर का जैसे ही वीर्य निकलना हुआ उसने अनंगवती के सर को कसकर अपने लंड पे दबा दिया और अपना वीर्य उसकी हलक में उतारने लगा ।
कबीर - आह... पी जा... सब पी जा मेरी बच्ची... ओह्ह्ह...
अनंगवती की हालत ख़राब हो गयी थी । उसका तो दम घुटने लगा था और अपने जीवन के इस पहले वीर्य के स्वाद से उसको उबकाई आने लगी थी ।
कबीर ने अपना सारा वीर्य अच्छे से पिलाने के बाद अपना लंड बाहर निकाला तो अनंगवती खासने लगी और उसके आंसू बहने लगे ।
कबीर ने अब अनंगवती को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर लेट के उसके स्तन चूसने लगा ।
अनंगवती भी अपने पहले जिस्मानी सुख से गरम होने लगी और उसे मस्ती चढ़ने लगी ।
कबीर उसके स्तनों को दबाता तो कभी चाटता तो कभी चूसने लगता ।
अनंगवती कबीर के सर पे हाथ फेरते हुए सिसकियाँ लेने लगी ।
अनंगवती - आह... ओह्ह्ह... उम्म्म...
कबीर ने उसकी चूची को मुँह में भरा और उसे अपनी जीभ से चाटने लगा ।
अनंगवती के लिए और उसके जिस्म के लिए ये इतनी बड़ी बात थी की इतने से ही उसकी चूत झड़ने लगी ।
अनंगवती - आह... ये क्या किया मेरे साथ... मुझे ये क्या हो रहा है... मेरी सुसु निकल रही है... ओह्ह्ह... नही करो ऐसा... उफ्फ्फ्फ़....
अनंगवती जैसे ही झड़ी कबीर ने उसे देखा और बोला -
कबीर - मेरी जान वो तेरी सुसु नही थी तेरा वीर्य था । वैसे कैसा लगा तुझे...
अनंगवती ने कुछ नही बोला और शर्म से अपना मुँह फेर लिया ।
कबीर भी अब नीचे आया और उसके पैर फैलाके उसकी चूत पे हाथ रखा ।
चूत पे हाथ रखते ही अनंगवती सिहर उठी और बोली -
अनंगवती - छी... हाथ मत लगाओ... वो गन्दा है ।
कबीर - गन्दा नही है... ये तो अमृत है डार्लिंग...
और ये बोलके कबीर ने उसकी चूत पे अपना मुँह रख दिया ।
कबीर के मुँह रखते ही अनंगवती के पूरे बदन में झटके लगने लगे और वो मस्ती में फिर से गर्म होने लगी ।
कबीर अपनी जीभ घुमा के उसकी पूरी चूत चाटने लगा ।
अनंगवती भी मस्ती में बड़बड़ाती रही -
अनंगवती - ओह्ह्ह कबीर... आह कबीर... ये किस दुनियाँ की सैर करा रहे हो मुझे... आह...
कबीर उसकी चूत चाटता रहा और उसकी चूत भी अपने आंसू बहाती रही ।
कबीर ने उसकी कोरी, अनछुई, चिकनी और कुंवारी चूत को अपने हाथों से थोड़ा फैलाया और अपनी जीभ अंदर डाल के चूसने और चाटने लगा ।
अनंगवती तो पागल ही हो गयी और अपना सर पटकने लगी ।
अनंगवती - ओह्ह्ह मेरे कबीर... तुम तो मुझे जन्नत की सैर करा रहे हो... उफ्फ्फ... ऐसे ही करते रहो... उम्म्म...
कबीर की चुसाई से अनंगवती की चूत दुबारा झड़ने लगी और कबीर उसका सारा नमकीन पानी पीता रहा ।
अनंगवती का पूरा शरीर अकड़ गया था और उसने बिस्तर पे बिछी चादर को कस के पकड़ लिया ।
अनंगवती - मेरा वीर्य निकल रहा है... मैं हवा में उड़ रही हूँ... आअह्ह्ह... मेरा बदन पूरा हल्का हो गया कबीर... ओह्ह्ह... मुझे बचाओ... आह... उई... उम्म्म...
कबीर ने अनंगवती की चूत को अच्छे से निचोड़ा और फिर बोला -
कबीर - कसम से अनंगवती... बड़ी नमकीन है तू... बहुत नमक भरा है तेरे बदन में । तेरे जैसी हुस्न वाली के लिए तो तीसरा विश्व युद्ध भी हो जाए । वाह...
अनंगवती कबीर की बातों से शर्माती रही और उसे एकटक देखती रही ।
अनंगवती ने कबीर के चेहरे को पकड़ के ऊपर खींचा और उसके गाल पे ज़ोरदार पप्पी ली । इतनी ज़ोरदार की कबीर का गाल लाल हो गया ।
कबीर ने बोला -
कबीर - रुक जा जानेमन... काम अभी अधूरा है... असली काम तो अभी किया ही नही ।
कबीर की बात सुनके अनंगवती समझ गयी की कबीर अब उसकी चुदाई करने वाला है ।
अनंगवती ने खुद ही अपने पैर फैला दिए ।
कबीर ने अपना लंड उसकी चूत पे रखा और एक धक्का लगाया । कबीर के लंड का टोपा जाते ही अनंगवती की चीख निकल गयी -
अनंगवती - आअह्ह्ह... कबीर... निकालो इसे... मैं नही ले पाऊँगी... आह्ह... दुख रहा है... प्लीज निकाल दो...
कबीर ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और एक झटका लगाया ।
अनंगवती की फिर से चीख निकल गयी ।
अनंगवती - आह मम्मी... बचाओ मुझे... कबीर ने मेरी चूत फाड़ दी... आअह्ह्ह... नही... ओह्ह्ह... नही...
अनंगवती कबीर को धक्का देके उसे हटाने की कोशिश करती रही ।
तभी कबीर ने उसके होठों पे अपने होंठ रखे और एक झटका और लगाया । इस बार कबीर का लंड अनंगवती की चूत को फाड़ते हुए पूरा अंदर चला गया ।
दर्द के मारे अनंगवती की आँखें बाहर निकल आयी और साथ में उसके आंसू भी । बस चीख अंदर ही रह गयी क्योंकि मुँह बंद था ।
कबीर ने रुक के उसके होंठ चूसने शुरू किये और अपने हाथों से उसके स्तन भी दबाने शुरू किये ।
थोड़ी देर में ज़ब अनंगवती को आराम मिला तो कबीर ने धीरे धीरे अपनी कमर हिलानी शुरू की ।
अब अनंगवती को थोड़ा दर्द और थोड़ा मज़ा दोनों ही मिल रहे थे । कबीर ने धक्के लगाते हुए उसके होंठ आज़ाद किये तो वो बोली -
अनंगवती - आह कबीर... थोड़ा धीरे... दर्द होता है... आह...
कबीर ने भी अपनी रफ़्तार थोड़ी कम कर दी मगर थोड़ी ही देर में अनंगवती ने नीचे से कमर उठाते हुए खुद भी झटके देने शुरू किये तो कबीर ने भी रफ़्तार बढ़ा दी ।
अनंगवती - ओह्ह्ह कबीर... ये तो स्वर्ग से भी बढ़कर है... आह... मज़ा आ रहा है... थोड़ा तेज़ तेज़ चोदो मुझे... आह...
कबीर - हाँ मेरी जान... तुझे तो आज पूरा निचोड़ लूंगा मैं ।
अनंगवती - आह कबीर... निचोड़ लो मुझे... खा जाओ... उफ्फ्फ...
कबीर ने धुआंधार धक्के लगाने शुरू किये और वो बीच बीच में अनंगवती के स्तन चूसता जा रहा था ।
और नतीजन अनंगवती एक बार फिर अपने चरम सुख की दहलीज़ पे पहुँच गयी ।
अनंगवती - ओह्ह कबीर... मैं दुबारा आ रही हूँ... मेरा वीर्य निकलने वाला है... आह कबीर मैं आयी... मुझे रोको... बचाओ... कबीररररर... उफ्फ्फ्फ़...
और इसी के साथ अनंगवती झड़ती चली गयी और उसके गरम गरम वीर्य ने कबीर के वीर्य को भी आजाद करा दिया ।
कबीर - ले मेरी जान... मेरा सारा वीर्य ले ले... भर ले अपनी चूत मेरे वीर्य से... आह... अनंगवती... बन जा मेरे बच्चे की माँ... ओह्ह्ह... ओह्ह्ह... ओह्ह्ह...
कबीर के झड़ने के बाद दोनों की निढाल होके एक दूसरे की बाहों में समा गए और मुस्कुराते हुए हाँफ्ते रहे ।
 
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